तेज़ धार तलवार – मुफ्ती सलाहुद्दीन हाफिजहुल्लाह

रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के गुस्ताख के बारे में हनफी मसलक के अनुसार संक्षिप्त एवं सारगर्भित फतवा

                 गुस्ताखे रसूल पर

तेज़ धार तलवार

रुपांतरण:- मुफ्ती सलाहुद्दीन हाफिजहुल्लाह

 

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रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के गुस्ताख के बारे में हनफी मसलक के अनुसार संक्षिप्त एवं सारगर्भित फतवा

अनुवादक की कुछ बातें

अल्लाह ने मानवता की सफलता और मार्गदर्शन के लिए लगभग एक लाख चौबीस हजार (नबी) संदेष्टा भेजें। जो निस्वार्थ होकर अल्लाह के संदेश अल्लाह के बंदों तक पहुंचाते रहे। अल्लाह ने सभी नबियों, रसूलों को बुराइयों, निर्लजता से मुक्त कर दिया था। ताकि अल्लाह के बंदों को अल्लाह की ओर आमंत्रित करते समय, कोई उनके उस दोष का सहारा लेकर उनका विरोध न कर सके। यही कारण है कि किसी नबी के युग के लोगों को किसी भी नबी के आचरण पर धब्बा लगाने का साहस नहीं हुआ। नबी में उनको कोई दोष नहीं मिला, तो जादूगर और पागल का दोष उनपर लगाया। अल्लाह ने हर नबी के विरोधियों को संसार ही में व्यापक अजाब द्वारा बर्बाद कर दिया। कोई भी गुस्ताखे रसूल अजाब से बच न सका। चूंकि अल्लाह ने मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पूरे विश्व के लिए रहमत बनाकर भेजा है, तो आपके आने के बाद व्यापक अजाब का श्रृंखला रुक गया और व्यापक अजाब की जगह अपराधियों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कत्ल और किताल ने ले ली है। जो व्यापक अजाब की तुलना में अपराधियों के हक में बहुत बेहतर है, कि इसमें अपराधियों को सत्य-दिल से तौबा करने का अवसर भी मिलता है

कुछ तथाकथित इस्लामी विद्वान कहते हैं कि गुस्ताखे रसूल के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करना चाहिए बस यही काफी है। लेकिन यह भी विचारणीय बात है, कि जब लोकतंत्र ने ही स्वतंत्र विचारवाद के नाम पर इन लोगों को यह अपराध करने की छूट दी है, तो क्या प्राथमिकी दर्ज करने से गुस्ताखों को सजा मिलेगी, या वह लोकतांत्रिक व्यवस्था और सिद्धांत के कारण और इस अपराध के करने के लिए निर्भित होंगे। और क्या इस्लामी कानून को प्राथमिकी से बदला जा सकता है? नहीं बिल्कुल नहीं तो फिर गुस्ताखे रसूल को कत्ल करने के बजाए प्राथमिकी पर बल क्यों दिया जा रहा है?

गुस्ताखे रसूल की सजा के विषय में इस्लाम के आरंभ से अब तक बहुत सी किताबें लिखी गईं हैं जो अरबी इत्यादि में हैं बहुत मोटी हैं जिनका अध्ययन करना सामान्य व्यक्तियों के लिए थोड़ा कठिन है और कुछ पतली भी हैं। लेकिन जरूरत इस बात की थी कि उर्दू भाषा में बहुत ही संक्षिप्त पुस्तिका तैयार किया जाए, जिसमें हनफी न्यायशास्त्र के अनुसार गुस्ताखे रसूल की सजा, और उससे संबंधित संदेहों का जवाब दिया जाए। इस जरूरत को मुफ्ती सलाहुद्दीन साहब से भलीभांति पूरी की है।

चूंकि हिंदी भाषा में अब तक इस विषय की कोई पुस्तक, और पुस्तिका नजर से नहीं गुजरी। और भारतीय अधिकांश मुसलमानों को इस विषय से संबंधित जागरूक करने के लिए हिंदी भाषा में भी पुस्तिका की आवश्यकता थी। इसी लिए बंदा ने उचित समझा, कि इस पुस्तिका का हिंदी अनुवाद कर दिया जाए। ताकि भारतीय मुसलमानों के लिए भी हक को समझना आसान हो जाए। उसके बाद यदि कोई जीवित रहे, तो दलीलों के साथ जीवित रहे। और यदि कोई हलाक हो, तो दलीलों के साथ हलाक हो।

अल्लाह हम सबके लिए किताब को लाभदायक बनाए और सभी के लिए आखिरत की मोक्ष का साधन बनाए आमीन और इस किताब को रसूलुल्ला के गुस्ताखों के लिए अजाब का साधन बनाए आमीन

हिंदी अनुवादक

 

फतवे के संबंध में विद्वानों के विचार

शेख मुफ्ती अबूलबत्ताल नासिरुलहक खान साहिब हाफिजहुल्लाह (नाजिम ए आला फारूकी दार-उल-इफ्ता) की राय:

हज़रत मुफ्ती सलाहुद्दीन हफ़िज़हुल्लाह ने शातिमे रसूलुल्लाह के विषय पर एक व्यापक पुस्तिका संकलित की है, जिसे इस पापी को भी देखने का अवसर मिला है। मा शा अल्लाह यह पुस्तिका अपने विषय में अद्वितीय और संतोषजनक सामग्रियों पर मुश्तमिल है हर मुसलमान को इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिए। इस किताब की विशेषता यह है कि इसमें, जिम्मी और हरबी काफिरों की बदतमीजियों के लिए शरीयत की सजा को शरीयत के तर्कों की मदद से बयान किया गया है, और इसे हनफ़ी न्यायशास्त्र (फिक्ह) के तर्कों (दलीलों) के माध्यम से विस्तार से समझाया गया है, जिससे इस समय के मुसलमानों के संदेह दूर होंगे। और गुस्ताखे रसूल को उसके अंजाम तक पहुंचाना आसान हो जाएगा, यह पापी बंदा प्रार्थी है कि अल्लाह इस पुस्तिका को अधिक से अधिक उपयोगी बनाए। हमारे प्यारे मुफ्ती सलाहुद्दीन हाफिजुल्लाह के ज्ञान को और विकसित करे। हक का जो काम वह वर्तमान में कर रहे हैं, उन में सफलता प्रदान करे अल्लाह उन्हें सभी बुराइयों, आपदाओं दुश्मनों से पूरी तरह से सुरक्षित रखे

वा-अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि-व बरकातुह

खाकसार नासिरुल हक खान।

3 / रमजान १४४२ हिजरी १४ अप्रैल २०२१ ईसवी

 

शेख मुफ्ती मोइनुद्दीन नोमानी हफिजहुल्लाह (नोमानी दारुल-इफ्ता समूह के संस्थापक) की राय:

जहाँ तक मुझे पता है, इस लेख में वह सब कुछ है जो हर विशेष और सामान्य व्यक्ति को चाहिए थी। अल्हमदु लिल्लाह इस संक्षिप्त फतवे में सलाहुद्दीन साहब ने गुस्ताखे रसूल की सजा और किस स्थिति में उसके साथ क्या किया जाए पूर्णतः तर्को के साथ विवरण सहित बयान किया है।

अब कार्रवाई करने की जरूरत है।

अल्लाह तआला, आपकी परिश्रम को स्वीकार करे और इसे मोक्ष का स्रोत बना दे

और मुस्लिम उम्माह के हर वर्ग को इस से लाभान्वित होने में मदद करे

मोइनुद्दीन नोमानी मुजफ्फर नगरी

प्रशासक नोमानी दारुल इफ्ता समूह

 

शेख मुफ्ती इम्तियाज अंसारी हफिजहुल्लाह की राय

अल्हमदु लिल्लाह उक्त फतवा संक्षिप्त और सरगर्भित होने के साथ-साथ पूर्णतः उपयोगी भी है। अल्लाह मुफ्ती सलाहुद्दीन कासमी के प्रयासों को स्वीकार करे और परलोक के मोक्ष का साधन बनाए

इम्तियाज अंसारी

शिक्षक، जामिया इस्लामिया मजाहिरुल उलूम कंकपुर पांसकोड़ा

आरएस पूर्बा मदनापुर पश्चिम बंगाल

 

شاتم رسول کے بارے میں حنفی مسلک کے مطابق مختصر اور جامع فتویٰ

रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के गुस्ताख के बारे में हनफी मसलक के अनुसार संक्षिप्त एवं सारगर्भित फतवा

نحمد اللہ ونستعینہ ونستغفرہ ونعوذ باللہ من شرور أنفسنا ومن سیئات أعمالنا، ونصلي ونسلم علی رسولہ، أما بعد؛

فأعوذ باللہ من الشیطان الرجیم

بسم اللہ الرحمن الرحیم

اِنَّ الَّذِيۡنَ يُؤۡذُوۡنَ اللّٰهَ وَرَسُوۡلَهٗ لَعَنَهُمُ اللّٰهُ فِى الدُّنۡيَا وَالۡاٰخِرَةِ وَاَعَدَّ لَهُمۡ عَذَابًا مُّهِيۡنًا ۞

अनुवाद:

जो लोग अल्लाह और उसके रसूल को दुःख देते हैं, अल्लाह ने संसार और परलोक में उनपर फिटकार किया है। और उनके लिए ऐसा दंड तैयार किया है, जो अपमानित करके रख देगा,

सुरह अहजाब आयत सं० ५७

وَالَّذِيۡنَ يُؤۡذُوۡنَ الۡمُؤۡمِنِيۡنَ وَالۡمُؤۡمِنٰتِ بِغَيۡرِ مَا اكۡتَسَبُوۡا فَقَدِ احۡتَمَلُوۡا بُهۡتَانًا وَّاِثۡمًا مُّبِيۡنًا ۞

अनुवाद:

और जो लोग ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों को उनके किसी अपराध के बिना दुःख देते हैं, उन्होंने झूठे आरोप और स्पष्ट पाप का बोझ अपने ऊपर उठा लिया है। (सुरह अहजाब आयत सं०५८)

مَّلۡـعُوۡنِيۡنَ ‌ۛۚ اَيۡنَمَا ثُقِفُوۡۤا اُخِذُوۡا وَقُتِّلُوۡا تَقۡتِيۡلًا ۞

अनुवाद:

जिनमें वह फिटकारे हुए होंगे, फिर जहां कहीं मिलेंगे, पकड़ लिए जाएंगे, और उन्हें एक एक करके कत्ल कर दिया जाएगा। (सुरह अहजाब आयत सं० ६१)

हदीस शरीफ़ में इरशाद है।

مَنْ بّدَّلَ دِیْنَہ فاقْتلُوہ

बुखारी शरीफ में हदीस आई है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया। जो व्यक्ति अपना दीन इस्लाम बदल कर कुफ्र अपनाए, अर्थात मुर्तद्द हो जाए, उसे कत्ल कर दो।

 

रसूलुल्लाह के गुस्ताख से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न और उनके उत्तर।

१ रसूलुल्ला के गुस्ताख से संबंधित अहनाफ का क्या निर्णय है?

२ गुस्ताख यदि जिम्मी (इस्लामी हुकूमत के अंतर्गत रहने वाला काफिर) हो?

३ गुस्ताख अगर मुसलमान हो?

४ गुस्ताख यदि हरबी काफिर (इस्लामी हुकूमत के अंतर्गत न रहने वाला काफिर हो)?

५ तौबा करके मुसलमान हो जाए तो क्या हुक्म है?

६ अभद्र शब्दों का प्रयोग करना और गुस्ताखी यदि उसका व्यवसाय हो

७ गुस्ताख को कौन कत्ल करेगा?

८ रसूलुल्ला के युग में गुस्ताखों को कौन कत्ल करता था?

९ क्या गुस्ताख को कत्ल करने के लोर हुकूमत की अनुमति की आवश्यकता है? यदि हुकूमत कत्ल न करे तो क्या करना है?

१० गुस्ताख और दूसरे काफिरों के बीच क्या अंतर है

 

***रसूल के गुस्ताख से सबंधित अहनाफ का फैसला**”

गुस्ताख अगर मुसलमान हो:

रसूलुल्लाह के लिए अपशब्द, अशिष्टता का व्यवहार करने वाला, आपका अपमान करने वाला काफिर है, और जो उसके काफिर होने में शक करे, वह भी काफिर है।

अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी रहिमहुल्लाह इकफारुल मुल्हिदीन में इमाम इब्ने तैमिया का कथन नकल करते हैं। हाफिज विशेष्य रहिमहुल्लाह अससारिमुल मसलूल पृष्ठ २४३ पर लिखते हैं।

तो पता चला की अंबिया अलैहिमुस्सलाम (अल्लाह के संदेष्टाओं) की शान में अभद्र शब्दों का प्रयोग और गुस्ताखी सभी कुफरियात का श्रोत, और सभी गुमराहियों का श्रोत है, जैसा कि अंबिया पर ईमान और उनको सच्चा समझना दीन, ईमान की सभी शाखाओं की जड़, नीव और मार्गदर्शन के सभी मसाइल का श्रोत है। (इकफारुल मुल्हिदीन उर्दू पृष्ठ सं० २२६)

अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी लिखते हैं।

काज़ी अबू यूसुफ रहीमहुल्लाह किताबुल खराज़ फसलुल हुक्म फिल मुर्तद्द अनिल इस्लाम पृष्ठ सं० १८२ पर लिखते हैं।

जो मुसलमान रसूलुल्लाह के लिए अपशब्द बोले, या आपको झूठा कहे, या आपमें दोष निकाले, या किसी भी प्रकार से आपका अपमान करे, वह काफिर है, उसकी बीवी उसके निकाह से निकल जाएगी। (इकफारुल मुल्हिदीन उर्दू पृष्ठ सं० १३७)

अल्लामा अनवर शाह कश्मीरी दूसरी जगह लिखते हैं।

“उसी अससारिमुल मसलूल अला शातिमीर रसूल में पृष्ठ सं० ४८३ पर हाफिज इब्ने तैमिया लिखते हैं।”

“(रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के गुस्ताख के काफिर और मुर्तद्द होने की) छठी दलील सहाबा किराम रजियल्लाहु अंहुम अजमईन के अकवाल और फैसले हैं। यह सभी कथन गुस्ताखे रसूल की सजा कत्ल निर्धारित होने में नस्से कतई हैं।

उदाहरणतया:- हजरत उमर फारूक का फरमान कि जो व्यक्ति अल्लाह की शान में या नबियों में से किसी भी नबी की शान में अभद्र टिप्पणी करे, उसे कत्ल कर दो। हजरत उमर फारूक ने अपने इस कथन में उसकी सजा कत्ल निर्धारित कर दिया। (इकफारुल मुल्हिदीन उर्दू पृष्ठ सं० २१४)

दूसरी जगह अल्लामा कश्मीरी लिखते हैं, कि काज़ी अयाज़ शिफा में लिखते हैं।

“रसूलुल्लाह की शान में अभद्र टिप्पणी करने वाला , गुस्ताखी करने वाला काफिर है, और जो उसके दंडित, और काफिर होने में शक करे, वह भी काफिर है। मुसलमानों का इसपर इजमा है। (इस मसले में कोई मतभेद नहीं है)۔“

अल्लामा कश्मीरी आगे लिखते हैं।

हम हाफिज इब्ने तैमिया की किताब अससारीमुल मसलुल के कुछ महत्त्वपूर्ण इकतिबासात इस मसअले पर प्रस्तुत करते हैं, कि नबियों का दोष निकालना, और उनका अपमान करना, पूर्णतः कुफ्र है। बल्कि सबसे बड़ा कुफ्र है। अल्लामा विशेष्य ने इस किताब में इस मसअला को पूरे व्याख्या के साथ बयान किया है। और कुरआन, सुन्नत, इजमा और कयास से प्राप्त दलीलों से किताब को भर दिया है, और यह साबित किया है, कि रसूलुल्लाह को स्वयं अधिकार था, चाहे अभद्र शब्द प्रयोग करने वाले या गुस्ताखी करने वाले को कत्ल कर दें, या क्षमा कर दें, चुनांचे रसूलुल्लाह के युग में दोनों प्रकार के वाकियात पाए गए हैं। लेकिन उम्मत पर गुस्ताखे रसूल को कत्ल करना फर्ज है। बाकी उससे तौबा कराने, या न कराने, और सांसारिक अहकाम में उसकी तौबा कुबूल होने या न होने में निसंदेह उम्मत के उलमा का मतभेद है। (लेकिन उसके काफिर होने में कोई मतभेद नहीं है यही पूरी किताब का सारांश है।) (इकफारुल मुल्हिदीन उर्दू पृष्ठ २१३-२१४)

 

***गुस्ताख यदि जिम्मी हो***

आगे चलकर अल्लामा कश्मीरी रहिमहुल्लाह इब्ने तैमिया रहिमहुल्लाह का कथन नकल करते हैं।

“लैस रहिमहुल्लाह कहते हैं, कि मुजाहिद रहिमहुल्लाह ने हजरत इब्ने अब्बास रजियल्लाहु अंह की रिवायत भी नकल की है। हजरत इब्ने अब्बास रजियल्लाहु अंह फरमाते हैं। किसी मुसलमान ने नबियों में से किसी नबी पर, या अल्लाह पर, अभद्र टिप्पणी की, उसने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को झुठलाया, और उसका यह काम इर्तिदाद है। उससे तौबा करने को कहा जाएगा, अगर तौबा कर ले, तो ठीक है, अन्यथा उसे कत्ल कर दिया जाएगा। और जिस किसी काफिर जिम्मी ने अल्लाह या किसी भी नबी की शान में अभद्र टिप्पणी की, या खुले आम कोई गुस्ताखी की, उसने (अपनी इस करतूत से प्राण व धन की रक्षा के) अहद को तोड़ दिया, अतः उसे कत्ल कर दो।

उदाहरणतया:- इब्ने अब्बास का फतवा, कि जिस किसी काफिर जिम्मी ने अल्लाह की शान में या नबियों में से किसी किसी भी नबी की शान में अभद्र टिप्पणी की, या खुले आम गुस्ताखी की, उसने खुद (शांति के) अहद को तोड़ दिया, अतः उसे कत्ल कर दो, तो देखो इब्ने अब्बास ने हर उस व्यक्ति के कत्ल का फतवा निर्धारित तौर पर दे दिया, जो किसी भी विशेष नबी पर अभद्र टिप्पणी करे,

या उदाहरणतया हजरत अबू बक्र का फरमान:- जो आपने मुहाजिर को उस महिला से संबंधित लिखा था, जिसने नबी की शान में अभद्र शब्द प्रयोग किया था। “यदि तुम खुद पहले फैसला नहीं कर चुके होते, तो मैं उस महिला को कत्ल करने का आदेश देता, इसलिए की नबियों की शान में गुस्ताखी करने वाले की सजा सामान्य दंड के समान नहीं होती। अतः जो मुसलमान ऐसा अपराध करे, वह मूर्तद्द है। और जो जिम्मी काफिर ऐसा अपराध करे, वह वादा को तोड़ने वाला, और मुहारिब है। (उसकी जान और धन दोनों हलाल हैं) (इकफारुल मुल्हिदीन उर्दू पृष्ठ सं० २१५)

 

***गुस्ताखे रसूल यदि हरबी हो।***

वैसे भी हरबी काफिर का तो पहले से ही खून और धन हलाल है, गुस्ताख होने के बाद तो और अधिक उचित रूप से उसको कत्ल करना जायज हो जाता है। अतः कोई हरबी काफिर रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी करता है, और बाद में तौबा करके मुसलमान नहीं होता, तो उसकी प्राण और धन हलाल होने में कोई संदेह नहीं है।

अगर तौबा करके मुसलमान हो जाए, धरती में बिगाड़ करने वाला न हो, और अभद्र शब्दों का प्रयोग, एवं गुस्ताखी उसकी आदत और व्यवसाय न हो, तो माफी मिल जाना ही असल है, इसलिए कि मुसलमान बन जाने से पिछले के सभी गुनाह माफ हो जाते हैं।

 

***गुस्ताखे रसूल की तौबा का हुक्म***

गुस्ताखे रसूल की तौबा के बारे में अल्लामा कश्मीरी इकफारुल मुल्हिदीन में लिखते हैं।

“गुस्ताखे रसूल की तौबा भी स्वीकृत नहीं, मजमउल अनहुर, दुर्रे मुख्तार, बज़जाजिया, दुरर, और खैरिया में लिखा है, कि नबियों में से किसी भी नबी की गुस्ताखी करने वाले काफिर की तौबा बिल्कुल स्वीकार नहीं की जाएगी। और जो उसके काफिर होने और दंडित होने में शक करे, वह भी काफिर है।

उसके बाद कहते हैं।

सांसारिक अहकाम के अनुसार तो उसकी तौबा स्वीकृत और वैध होने या न होने में फुकहा का मतभेद है, (कुछ कहते हैं गुस्ताखे रसूल की तौबा स्वीकृत नहीं, जैसाकि उपर्युक्त संदर्भों से स्पष्ट है। और कुछ उसकी तौबा को स्वीकार करते हैं। और कुछ के यहां उसमें कुछ तफसील है। मगर उसके और अल्लाह के बीच में तौबा स्वीकृत है। (अर्थात यदि सच्चे दिल से उसने तौबा की, और उसपर जीवन भर कायम रहा, तो आखिरत में इन शा अल्लाह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की गुस्ताखी के अजाब और कुफ्र से बच जाएगा। लेकिन खुलासतुल फतावा में अंकित है “मुहीत की इबारत की ओर लौटना चाहिए, कि उसमें मशाईखे हनफिया का यह कथन लिखा गया है, कि अल्लाह के नजदीक भी गुस्ताखे रसूल की तौबा स्वीकृत नहीं होगी।” मुझे यह कथन मुहीत की इबारत के अलावा कहीं नहीं मिला, हो सकता है, यह उनकी गलती हो।

(इकफारुल मुल्हिदीन उर्दू पृष्ठ १३७)

 

अल्लामा कश्मीरी रहिमहुल्लाह ने जिस मतभेद की ओर इशारा किया है, उसका सारांश यह है,

यदि गुस्ताख मुसलमान हो, तो इस बारे में अइम्मा किराम के मसालिक

इमाम मालिक और इमाम अहमद बिन हंबल के यहां नबी के अपमान की सजा हर स्थिति में कत्ल करना है, तौबा से पहले हो, या बाद में, हद के अनुसार उसे माफ नहीं किया जाएगा। हर स्थिति में उसे कत्ल ही करना होगा। चाहे तौबा करे, या न करे। और अहनाफ़ व शवाफे के अनुसार तौबा से पहले हद जारी होगी, तौबा के बाद हद नहीं रहेगी। अर्थात तौबा के बाद माफी मिल जाएगी, अगर सच्चे दिल से तौबा कर ले, और उसके शिष्टाचार, लक्षणों के परिवर्तन से भी इसका आभास हो, तो कत्ल करना वाजिब नहीं रहेगा। हां अगर धरती पर बिगाड़ करने वाला हो, या दुष्ट प्रकार का गुस्ताख हो, तौबा को अपने बचाव की पालिसी के रूप में अपनाए, तो तौबा के बाद भी कत्ल कर दिया जाएगा।

तो पता चला कि हनफी मसलक में तौबा कुबूल है, तौबा के पहले तक हद है, किसी के लिए माफ करने की अनुमति नहीं है। और बाद में हद नहीं रहेगी, इस स्थिति में माफी मिल जाएगी। लेकिन मुफसिद फिल अर्ज होने की स्थिति में राजनैतिक आधार पर कत्ल किया जाएगा।

अल्लामा शामी लिखते हैं।

نعم لو قيل إذ تكرر السب من هذا الشقي الخبيث بحيث أنه كلما أخذ تاب يقتل، وكذا لو ظهر أن ذلك معتاده و تجاهر به كان ذلك قولا وجيها كما ذكروا مثله في الذمي و يكون حينئذ بمنزلة الزنديق.

(तंबीहुल वुलाते वल हुक्काम अला अहकामि शातिमी खैरिल अनाम भाग १ पृष्ठ ३३५)

فإن قلت: ما الفرق بينه وبين المسلم حيث جزمت بأن مذهب أبي حنيفة وأصحابه أن الساب المسلم إذا تاب وأسلم لا يقتل؟ قلت: المسلم ظاهر حاله أن السب إنما صدر منه عن غيظ وحمق وسبق لسان لا عن اعتقاد جازم، فإذا تاب وأناب وأسلم قبلنا إسلامه. بخلاف الكافر فإن ظاهر حاله يدل على اعتقاد ما يقول وأنه أراد الطعن في الدين، ولذلك قلنا فيما مر أن المسلم أيضا إذا تكرر منه ذلك وصار معروفا بهذا الاعتقاد داعيا إليه يقتل ولا تقبل توبته وإسلامه كالزنديق فلا فرق حينئذ بين المسلم والذمي.

(तंबीहुल वुलाते वल हुक्काम अला अहकामि शातिमी खैरिल अनाम भाग १ पृष्ठ ३५५)

यदि कहा जाए जिम्मी और मुसलमान में क्या अंतर है, कि आप विश्वास के साथ कह रहे हैं, कि इमाम अबू हनीफा और उनके असहाब का मसलक यह है, कि गुस्ताख यदि मुसलमान हो, और तौबा करके मुसलमान हो जाए, तो कत्ल नहीं किया जाएगा। जिम्मी का मामला उसके विपरीत है, कि तौबा करके मुसलमान होने के बाद भी उसे माफ नहीं किया जाएगा।

उसके उत्तर में कहा जाएगा, स्पष्ट बात है, कि मुसलमान के मुंह से गुस्ताखी वाली बात, या तो गुस्सा के कारण, या गलती से निकल गई, यह उसकी धारणा नहीं है। जब वह तौबा करेगा, और मुसलमान हो जाएगा, तो हम उसकी तौबा स्वीकार कर लेंगे।

जिम्मी का मामला उसके विपरित है, क्योंकि स्पष्ट है, उसने गलत धारणा गलत आस्था के कारण ही अभद्र शब्दों का प्रयोग किया है, और दीने इस्लाम को दोषपूर्ण घोषित करने ही के उद्देश्य से ऐसा किया है, इसलिए उसकी तौबा स्वीकार नहीं की जाएगी। यह समझा जाएगा, कि कत्ल से बचने के लिए उसने ऐसा किया है, हम उसकी तौबा पर विश्वास नहीं कर सकते।

इसलिए हम पहले भी कह चुके हैं, कि यदि मुसलमान भी बार-बार ऐसा करे, तो हम उसकी तौबा स्वीकार नहीं करेंगे, बल्कि जिंदीक की तरह उसे कत्ल करेंगे। इस स्थिति में मुसलमान और जिम्मी के बीच में कोई अंतर नहीं है।

गुस्ताख को कत्ल कौन करेगा? क्या गुस्ताख को कत्ल करने के लिए हुकूमत की अनुमति की आवश्यकता है? यदि हुकूमत गुस्ताख को कत्ल न करे तो क्या करना है? रसूलुल्लाह के युग में गुस्ताख को कौन कत्ल करता था?

हर व्यक्ति जानता है, कि सहाबा किराम रजियल्लाहु अंहुम अजमईन मजलिस में ही गुस्ताख को कत्ल कर देते थे, नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अनुमति का इंतजार भी नहीं करते थे, इससे पता चला कि हर व्यक्ति गुस्ताखे रसूल को कत्ल कर सकता है। यदि हम काल्पनिक रूप में स्वीकार कर लेते हैं, कि गुस्ताख को कत्ल करना हुकूमत की जिम्मेवारी है, तब यह प्रश्न जरूर आएगा, कि यदि हुकूमत कत्ल न करे, तो कौन करेगा? बल्कि मामला ऐसा हो, कि हुकूमत स्वयं गुस्ताखे रसूल को पनाह देती हो, उसकी रक्षा करती हो, और अधिक गुस्ताख तैयार होने का अवसर प्रदान करती हो, तो क्या करना है?

ठीक…… प्रश्न यह है, की क्या गुस्ताख को कत्ल करने के लिए हुकूमत की अनुमति की आवश्यकता है?

उत्तर गुस्ताख को कत्ल करने के लिए न तो इमाम की आवश्यकता है, न दारुल इस्लाम की आवश्यकता है, बल्कि गुस्ताखे रसूल हरबी काफिर है, हर व्यक्ति उसे कत्ल कर सकता है।

गुस्ताख यदि पहले से ही मूलतः काफिर हो, जैसे हिंदू, ईसाई, यहूदी, इत्यादि तो उसका खून तो पहले से ही हलाल है, जबकि वह हरबी हो, क्योंकि हरबी काफिर को हर कोई कत्ल कर सकता है।

यदि पहले मुसलमान था, तो गुस्ताखे रसूल होने के कारण वह हरबी काफिर हो गया, और हरबी काफिर को हर मुसलमान कत्ल कर सकता है।

यदि हम सीरत की किताबों का अध्ययन करें, तो पता चलेगा, कि गुस्ताख औरत हो, या मर्द हो, सहाबा किराम ने उसे कत्ल कर दिया, अनुमति लेने की आवश्यकता भी नहीं समझी, रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इस काम पर प्रसन्नता प्रकट की, और सहाबा की प्रशंसा की, तो पता चला, कि गुस्ताख ऐसा अतिदुष्ट पशु है, जिसे जैसे संभव हो, संसार से विदा कर देने में इमाम की अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है। बल्कि अनुमति के इंतजार में रहना ईमानी स्वाभिमान के विपरीत है। क्योंकि ईमानी स्वाभिमान और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत का भी यही तकाजा है, कि जहां भी गुस्ताख मिले, उसे कत्ल कर दिया जाए। इसलिए सहाबा किराम तुरंत कत्ल कर देते थे, जबकि उस समय रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जीवित थे, गुस्ताख को माफ कर देने का अधिकार भी आपको प्राप्त था, फिर भी सहाबा किराम रजियल्लाहु अंहुम अजमईन ने कभी भी यह जानने का प्रयास नहीं किया, कि उसको माफ करेंगे या नहीं।

अब तो उम्मत के लिए माफ कर देने की गुंजाइश ही नहीं है, तो यह दावा कैसे किया जा सकता है, कि सामान्य मुसलमान के लिए गुस्ताख को कत्ल करना जायज नहीं है, जबकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उपस्थिति में उनकी अनुमति के बिना गुस्ताख को कत्ल कर दिया गया, और यह काम प्रशंसा जनक भी हुआ, तो किसी को यह अधिकार कैसे प्राप्त हो सकता है, कि वह गुस्ताखे रसूल के कत्ल को उम्मत के लिए हराम घोषित करे।

लेकिन यहां एक बात यह याद रखनी चाहिए, कि फिक्ह की किताबों में यह लिखा है, कि इमाम की अनुमति से पहले किसी भी मुर्तद्द को कोई कत्ल न करे, क्योंकि इमाम बनाया ही इसलिए गया है, कि इस प्रकार के हुदूद स्थापित करे, यह बात सामान्य मुर्तद्द के लिए है, गुस्ताखे रसूल के लिए नहीं है, जिसका हमने भी सीरत के संदर्भ से अध्ययन किया है। सामान्य मुर्तद्द को भी यदि कोई तौबा से पहले कत्ल कर दे, तो यह काम अच्छा नहीं है, लेकिन हराम भी नहीं है। केवल इमाम के अधिकार का हनन होगा।

अब विश्व में जबकि हमारा कोई इमाम नहीं है, तो इमाम का अधिकार भी नहीं है, लेकिन जहां मुसलमानों के अमीर हैं, और काज़ी भी हैं, और पूर्ण स्वतंत्रता से शरई हुदूद और किसास जारी कर सकते हैं, जैसे सोमालिया, इमारते इस्लामिया अफगानिस्तान, इत्यादि जैसे स्थानों में जहां मुजाहिदीन की हुकूमत है, वहां किसी सामान्य मुसलमान के लिए कोई सजा देने की आवश्यकता नहीं है।

सामान्य मूर्तद्द को भी इमाम की अनुमति से पहले कत्ल करना जायज है उसकी दलीलें

इब्ने आबिदीन शामी लिखते हैं।

(فإن أسلم) … (وإلا قتل) لحديث «من بدل دينه فاقتلوه» … (قوله وإلا قتل) … “قال في المنح: وأطلق فشمل الإمام وغيره، لكن إن قتله غيره أو قطع عضوا منه بلا إذن الإمام أدبه الإمام.

अनुवाद: अल्लामा इब्न आबिदीन शामी का कहना है कि अगर वह इस्लाम स्वीकार करके मुसलमान बन जाता है तो ठीक है … नहीं तो इस हदीस«من بدل دينه فاقتلوه» के आधार पर उसे मार दिया जाएगा। उसके शब्द (والا قتل) अल-मुनह में कहते हैं। इसे यहाँ पूर्ण रखा गया है, तो इसमें इमाम और गैर-इमाम दोनों शामिल हैं, लेकिन अगर कोई और उसे इमाम की अनुमति के बिना कत्ल करता है या उसके किसी भी अंग को काट देता है , तो इमाम हत्यारे को कुछ दंड दे सकता है।

(रद्दुल मुहतार भाग ४ पृष्ठ २२६)

बहरूर राइक में है।

أطلقه فشمل قتل الإمام وغيره لكن إن قتله غيره أو قطع عضوا منه بغير إذن الإمام أدبه الإمام كما في شرح الطحاوي.

البحر الرائق شرح كنز الدقائق ومنحة الخالق وتكملة الطوري (5/ 139)

अनुवाद: इसे यहां पूर्ण रखा गया है तो इसमें इमाम और गैर इमाम दोनों शामिल हैं, लेकिन अगर इमाम के अलावा किसी और ने इमाम की अनुमति के बिना उसे मार डाला या उसके किसी अंग को काट दिया, तो इमाम उसे कुछ सजा दे सकते हैं।

फतहुल कदीर में है।

(فإن قتله قاتل قبل عرض الإسلام عليه) أو قطع عضوا منه (كره ذلك، ولا شيء على القاتل) والقاطع (لأن الكفر مبيح) وكل جناية على المرتد هدر (ومعنى الكراهة هنا ترك المستحب) فهي كراهة تنزيه. فتح القدير للكمال ابن الهمام (6/ 71)

अनुवाद: यदि कोई व्यक्ति उस (मूर्तद्द) पर इस्लाम पेश करने से पहले उसे मार डालता है या उसके किसी भी अंग को काट देता है, तो यह मकरूह होगा, और उसके अंगों को मारने और काटने वाले के लिए कोई सजा नहीं होगी। क्योंकि (इस्लाम के बाद) अविश्वास (कुफ्र) धर्मत्यागी (मूर्तद्द) के जीवन और संपत्ति को हलाल कर देता है, और यदि किसी ने धर्मत्यागी पर किसी प्रकार का अत्याचार किया , तो वह बेकार हो जाएगा (इस कारण हत्यारे और अपराधी पर कुछ भी अनिवार्य नहीं होगा) (और यहाँ यह मकरूह का अर्थ है मुस्तहब का परित्याग करना) तो यह मकरूह तनजीही होगा।(फतहुल कदीर भाग ६ पृष्ठ ७१)

और जब सामान्य मुर्तद्द को ही दारुल इस्लाम में इमाम रहते हुए, अनुमति के बिना कत्ल करना जायज है, और इजाजत लेना मुस्तहब है, तो गुस्ताखे रसूल की तो कोई बात ही नहीं है, और जब स्थिति ऐसी है, कि न दारुल इस्लाम है, न इमाम है, अब तो अनुमति का प्रश्न ही नहीं है।

और एक संदेह यह है, कि गुस्ताखे रसूल को कत्ल करना हद है, और हद जारी करने के लिए इमाम की आवश्यकता है, अब हमारा इमाम नहीं, तो गुस्ताख को कैसे कत्ल किया जाएगा?

और एक संदेह यह भी है, कि अहनाफ के यहां हद स्थापित करने के लिए दारुल इस्लाम होना जरूरी है, हम तो दारुल हरब में हैं।

उसके उत्तर में हम कहेंगे, कि यह बात सही है, कि हद स्थापित करने के लिए दारुल इस्लाम और इमाम की आवश्यकता है, हम स्वीकार करते हैं, लेकिन गुस्ताखे रसूल और मुर्तद्द का मामला कुछ भिन्न है, कहने का तात्पर्य यह है, कि चाहे गुस्ताखे रसूल हो, या सामान्य मुर्तद्द हो, जैस भी हो वह काफिर है, अब प्रश्न यह है, कि काफिरों में से वह किस प्रकार का काफिर है, स्पष्ट है कि हरबी काफिर ही होगा, क्योंकि मुआहिद काफिर तीन प्रकार के होते हैं। एक “जिम्मी” जो कि जिज्या की शर्त पर दारुल इस्लाम में रहता है, और दारुल इस्लाम का रहने वाला हो जाता है।

दूसरा “मुआहिद” दारुल हरब का रहने वाला काफिर, जिसके साथ मुसलमानों की वक्ती तौर पर लड़ाई बंद करने पर समझौता हुआ हो।

तीसरा “मुस्तामिन” दारुल कुफ्र का रहने वाला काफिर, जोकि मुसलमानों से वक्ती तौर पर अमान लेकर दारुल इस्लाम में व्यापार इत्यादि के लिए आया हो।

मुर्तद्द इन तीनों में से नहीं है, तो वह हरबी काफिर ही होगा, बल्कि और दुष्ट काफिर होगा, और यदि गुस्ताख हो, तो फिर अधिक दुष्ट कठोर काफिर होगा।

अतः उसका कत्ल मुसलमानों में से जो कोई भी कर दे, कोई हर्ज नहीं। दारुल हर्ब और दारुल इस्लाम जहां कहीं भी मिले, उसे कत्ल कर सकते हैं, उसका खून हलाल है। पता चला कि हम गुस्ताखे रसूल को हद के आधार पर नहीं कत्ल करेंगे, बल्कि हरबी काफिर होने के आधार पर कत्ल करेंगे।

لأنه بالردة صار كالحربي في حكم القتل، ولكل مسلم قتل الحربي الذي لا أمان له.

(शरह अस्सियरुल कबीर पृष्ठ 1938)

इमाम सरखसी शरह अस्सियरुल कबीर में लिखते हैं। (मालिक अपने मुर्तद्द गुलाम को कत्ल कर सकता है।) क्योंकि वह मुर्तद्द होने के कारण वह हरबी के समान हो गया, हर मुसलमान के लिए ऐसे हरबी काफिर को कत्ल करना जायज है। जिसका कोई अमान न हो।

अब प्रश्न यह हो सकता है, कि मुर्तद्द और गुस्ताखे रसूल के बीच क्या अंतर है, उसके उत्तर में हम कहेंगे, गुस्ताखे रसूल का हुक्म सामान्य मुर्तद्द से कठोर है, गुस्ताखे रसूल यदि औरत हो, फिर भी वह कत्ल से नहीं बचेगी, जबकि सामान्य मुर्तद्द और हरबी औरत का मसअला भिन्न है।

गुस्ताखे रसूल यदि औरत हो, उसको भी भी कत्ल किया जाएगा। सामान्यतः हरबी औरत को कत्ल करना मना है, लेकिन गुस्ताखे रसूल है तो कत्ल कर देना जायज़ है।

इमाम सरखसी लिखते हैं।

وكذلك إن كانت تعلن شتم رسول الله – صلى الله عليه وآله وسلم -، فلا بأس بقتلها.

(शरह अस्सियरुल कबीर पृष्ठ १४१७)

यदि हरबी काफिर औरत रसूलुल्लाह पर खुले आम अभद्र टिप्पणी करे, तो उसको कत्ल करने में कोई हर्ज नहीं है।

इब्ने आबिदीन शामी लिखते हैं।

فهو مخصوص من عموم النهي عن قتل النساء من أهل الحرب. (الدر المختار وحاشية ابن عابدين، رد المحتار 4/ 216)

यह अहले हर्ब की औरतों के कत्ल की ममानत से बाहर है।

गुस्ताखे रसूल यदि बाप हो, फिर भी कत्ल से नहीं बचेगा, गुस्ताखे रसूल यदि बाप हो, फिर भी माफी नहीं है। जबकि मुशरिक बाप को कत्ल करना मना है।

इब्नुल हमाम लिखते हैं।

وينبغي أنه لو سمع أباه المشرك يذكر الله أو رسوله بسوء يكون له قتله لما روي ”أن أبا عبيدة بن الجراح رضی اللہ عنہ قتل أباه حين سمعه يسب النبي – صلى الله عليه وسلم – وشرف وكرم، فلم ينكر النبي – صلى الله عليه وسلم – ذلك“

(फतहुल कदीर 5/ 454)

यदि कोई मुस्लिम अपने बाप को अल्लाह और उसके रसूल के बारे में अशिष्टता की बात करते हुए सुने, तो उसे भी कत्ल कर देना जायज़ है, जैसा कि मरवी है, कि हजरत अबू उबैदा बिन अलजरराह ने अपने बाप को कत्ल किया था, जो रसूलुल्लाह के बारे में अपशब्द का प्रयोग करता था, और रसूलुल्लाह ने उसपर नकीर नहीं की।

हमने देखा कि गुस्ताखे रसूल को कत्ल करने के लिए न तो इमाम की आवश्यकता है, न तो दारुल इस्लाम की आवश्यकता है, बल्कि गुस्ताखे रसूल हरबी काफिर है, हर कोई उसे कत्ल कर सकता है।

गुस्ताखे रसूल यदि पहले से ही मूलतः काफिर हो, जैसे हिंदू, ईसाई, यहूदी, इत्यादि तो उसका खून तो पहले से ही हलाल है, जबकि हरबी हो, क्योंकि हरबी काफिर को कोई भी मुसलमान कत्ल कर सकता है, यदि कोई पहले मुसलमान था, अब गुस्ताखी के कारण हरबी काफिर हो गया, तो उस हरबी काफिर को कोई भी मुसलमान कत्ल कर सकता है। यहां तक कि गुस्ताख औरत हो, या अपना बाप हो, उसको भी कत्ल से मुक्ति नहीं मिलेगी।

तो हमने गुस्ताख के कत्ल करने के बारे में जो कहा है, कि हद के आधार पर उसका कत्ल नहीं होगा, बल्कि हरबी काफिर होने के आधार पर उसका कत्ल किया जाएगा, तो अब किसी आपत्ति की कोई गुंजाइश ही नहीं रही, कि हद कायम करना इमाम की जिम्मेदारी है, यह बात अपनी जगह ठीक है, लेकिन गुस्ताख का मसला उससे भिन्न है, इसलिए कि वह हरबी काफिर है, और हरबी काफिर को कोई भी मुसलमान कत्ल कर सकता है।

इमाम की अनुमति के बिना, और दारुल हर्ब में, गुस्ताख हरबी काफिर को कत्ल करने के जायज होने के बारे में, अंग्रेज के शासनकाल ६ अप्रैल १९२९ में गाज़ी इलमुद्दीन शहीद रहिमहुल्लाह का राज्यपाल को कत्ल करना, और उस समय के आलिमों की ओर से राज्यपाल को कत्ल करने पर उभारना, कत्ल करने के बाद सभी आलिमो की ओर से उसे स्वीकार कर लेना, समीप भूतकाल से लेकर वर्तमान के आलिमों का राज्यपाल के कत्ल के जायज होने पर इजमा होना, किसी की ओर से नाजायज होने का फतवा न आना, समीप भूतकाल की सबसे बड़ी दलील है।

चेतावनी: याद रखिए! कि सामान्य हरबी काफिर के कत्ल से संबंधित मसअला यह है, कि कत्ल करना जायज है। इसका यह अर्थ नहीं है, कि हम सभी हरबी काफिरों को कत्ल करना आरंभ कर दें, नहीं, यह अर्थ नहीं है, बल्कि हर जायज काम करना हमेशा लाभदायक नहीं होता, हमें मसलहत और मफसदा की ओर ध्यान रखना होगा, और हरबी काफिर को अपराध के अनुसार देखना होगा, जो कठोर अपराधी है, धरती पर फसाद करने वाला है, गुस्ताखे रसूल, या अल्लाह का गुस्ताख है, उसको और उस जैसे दूसरे हरबी काफिरों को जैसे भी अवसर मिले कत्ल कर देना जरूरी है। बाकी अन्य हरबी सामान्य काफिरों को अभी हम कत्ल करने के लिए नहीं कहते, अगरचे उनको भी कत्ल करना जायज है। मगर मसलहत के खिलाफ है।

ھذا ما عندی واللہ أعلم بالصواب وعلمہ أکمل وأتم وأصوب۔

रूपांतरण:- मुफ्ती सलाहुद्दीन गुफिर लह

संशोधन

1: मुफ्ती फारूक महोदय (संस्थापक फारूकी दारुल इफ्ता)

2: मुफ्ती अबुल बत्ताल नासिरूल हक महोदय (उच्चायक फारूकी दारुल इफ्ता)

3: मुफ्ती मरगूबुर रहमान अलकासमी ( मुजीब एवं मुख्य व्यवस्थापक अलमसाइलुश शरईया अल हनफिया)

4: गुमनाम मुसाफिर महोदय (मुख्य व्यवस्थापक फारूकी दारुल इफ्ता)

5: शेख मुफ्ती मोइनुद्दीन नोमानी हफिजहुल्लाह (नोमानी दारुल-इफ्ता समूह)

6: शेख मुफ्ती इम्तियाज अंसारी हफिजहुल्लाह- शिक्षक, जामिया इस्लामिया मजाहिरुल उलूम कंकपुर

7: मुफ्ती आसिम महमूद महोदय (उच्चायुक्त राहे हिदायत ग्रुप)

 

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