निर्बचन से दूर रहें और अपना ईमान बचाएं – नूरुद्दीन महमूद

निर्बचन से दूर रहें और अपना ईमान बचाएं

                     – नूरुद्दीन महमूद

 

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निर्वाचन से दूर रहें और अपना ईमान बचाएं

                         – नूरुद्दीन महमूद

 

आपकी सेवा में मौजूद पुस्तक वास्तव में “انتخابات سے دور رہیں اپنا ایمان بچائیں” नाम की एक उर्दू पुस्तक का हिंदी अनुवाद है, इसके मूल लेखक नूरुद्दीन महमूद हैं, उसका हिंदी अनुवाद और प्रकाशन का काम जिहाद और शहादत से मुहब्बत रखने वाले कुछ भाइयों ने अंजाम दिया।

यह पुस्तक ‘अन-नूर’ पुस्तकालय की ओर से प्रकाशित की गई है। अल्लाह सर्वशक्तिमान इस पुस्तक को उम्मत के लिए फायदेमंद और मार्गदर्शन का स्रोत बनाये और पुस्तक से जुड़े हुए सभी भाइयों को उत्त्म बदला दें आमीन।

-प्रकाशक

 

بسم اللہ الرحمن الرحیم الحمدللہ رب العالمین و الصلوٰۃ والسلام علیٰ سید المرسلین و آلہ و اصحابہ اجمعین

मेरे मुसलमान भाईयो!
अस्सलामु अलैकुम व रहतुल्लाहि व बरकातुह
आज कल निर्वाचन की भाग दौड़ में प्रत्येक विशेष एवं सामान्य व्यक्ति व्यस्त है।
धर्मनिष्ठ मुसलमान हृदय थाम के बैठे हैं, कि या अल्लाह! यह क्या हो रहा है। झूठ, धोखा, चित्रांकन, गीबतें, झूठे आरोप, मुसलमानों को सताना, कौनसे पाप हैं, जो नहीं हो रहे हैं। गुनाहों, पापों के बाढ़ हैं, जो कितने ही लोगों के ईमान तक बहाकर ले जाते हैं।
निम्नांकित पंक्तियों में संक्षेप में निर्वाचन और लोकतंत्र का शरई हुक्म, अपने मुसलमान भाइयों की सेवा में पेश किया जा रहा है। ताकि मुसलमान अपने ईमान और प्रलोक (आखिरत) को सुरक्षित कर सकें।
निर्वाचन लोकतंत्र का भाग है, लोक तंत्र के कुफ्र होने पर सभी इस्लामी उलमा सहमत हैं, लोक तंत्र कभी भी इस्लामी नहीं हो सकती, यह केवल धोखा है। आश्चर्यजनक बात है, कि यहुदियत, ईसाईयत जो आसमानी धर्म हैं, इस्लामी नहीं हो सकतीं, तो लोकतंत्र जो मानव निर्मित एक व्यवस्था है कैसे इस्लामी हो सकती है।

 

इस्लाम और लोक तंत्र में अंतर

1. इस्लाम में मूलतः कानून बनानेवाला अल्लाह है। लोकतंत्र में कानून बनानेवाला असल पार्लियामेंट है। यहां तक कि कुरआन भी पार्लियामेंट की स्वीकृति के बिना कानून नहीं।
2.इस्लाम में कुरआन के लिए किसी स्वीकृति को आवश्यक समझना स्पष्ट कुफ्र है, और लोकतंत्र में पार्लियामेंट की पवित्रता, महत्ता और अधिकार को न मानना हुकूमत से बगावत है।
3. इस्लाम में जो भी व्यक्ति इस्लाम के किसी ज़रूरी, बुनियादी धारणा या आदेश का इंकार करे वह काफिर है। लोकतंत्र में जिसे पार्लियामेंट काफिर न कहे वह काफिर नहीं। जैसे शिया, मल्हिदीन, और मुंकिरीने हदीस इत्यादि।
4. इस्लाम में मुर्तद्द का क़त्ल वाजिब है। लोक तंत्र में धार्मिक स्वतंत्रता है, अल्पसंख्यक के अधिकार उन्हें मिलेंगे।
5. इस्लाम के अनुसार मुसलमान और काफिर समान नहीं। लोक तंत्र में समान हैं, एक वोट भी अधिक हो तो काफिर बेहतर है।
6. इस्लाम के अनुसार आलिम (ज्ञानी) और (अज्ञानी) जाहिल बराबर नहीं है। लोकतंत्र में बराबर है एक वोट भी अधिक हो तो जाहिल बेहतर है।
7. इस्लाम के अनुसार अच्छा और बुरा बराबर नहीं। लोक तंत्र में बराबर हैं, एक वोट भी अधिक हो तो बुरा व्यक्ति बेहतर है।
8. इस्लाम में पुरूष महिलाओं के शासक और निगहबान हैं। लोक तंत्र में पुरुष और महिलाएं एक समान हैं।
9. इस्लाम के अनुसार महिलाएं सरबराह(शासक) नहीं हो सकतीं। लोक तंत्र में बिल्कुल हो सकती हैं।
10. इस्लाम के अनुसार पार्टीबाजी निषेध (हराम) है, इससे मुसलमान बिखर जाते हैं। लोकतंत्र में किसी भी उद्देश्य के लिए पार्टी बनाना कानूनी है।
11.इस्लाम के अनुसार पार्टियां बनाकर मुसलमानों की एकता भंग करने वाले नेताओं का क़त्ल वाजिब है। लोक तंत्र में उनको सुरक्षा देना राज्य की ज़िम्मेदारी है।
12. इस्लाम के अनुसार जो पद मांगे, वह अयोग्य है। लोक तंत्र में पद मांगना ज़रूरी है, और उसे प्राप्त करने के लिए हर प्रकार का यथासंभव प्रयत्न करना ज़रूरी है।
13.इस्लाम के अनुसार राय सिर्फ अहले हल्लो अक्द (धर्मनिष्ठ शरियत के पाबंद उलमा जिनकी बुद्धि पूर्ण हो) से ली जाएगी। लोक तंत्र में राय(वोट) हर वयस्क का अधिकार है, जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक हो।
14. इस्लाम के अनुसार निर्णय अमिरुल मोमिनीन या उसका निर्धारित व्यक्ति ही लेगा, लोक तंत्र में निर्णय बहुमत के आधार पर होगा, जिसे अधिकांश लोग चयन करे वहीं चयनित है।
15. इस्लाम में अपनी प्रशंसा करना मना है, लोक तंत्र में यह काम करने में कोई हर्ज नहीं।
16. इस्लाम में काफिर से राय नहीं ली जाएगी, लोक तंत्र में राय ली जाएगी।
17. इस्लाम के अनुसार फासिक़ (बद अमल, पापी) मुसलमान को भी राय का अधिकार नहीं, लोक तंत्र में है।
18. इस्लाम के अनुसार अमीर जीवन भर अमीर रहता है। लोक तंत्र के अनुसार एक निर्धारित समय के लिए अमीर होता है।
19. इस्लाम में हिंसा एवं पाप के कारण अमीर को हटा दिया जाएगा, लोक तंत्र में सत्ताकाल में वह जो चाहे करे, उसे नहीं हटाया जा सकता। मगर यह कि वह देश के कानून के अंतर्गत फंस जाए।
20. इस्लाम के अनुसार हक की कसौटी क़ुरआन और सुन्नत है। लोक तंत्र में हक की कसौटी बहुमत (अक्सरियत) है।
21. इस्लाम के अनुसार काफिर मुसलमानों का छोटा या बड़ा शासक नहीं हो सकता, लोक तंत्र में हो सकता है।
22. इस्लाम के अनुसार सत्ताधारी और विपक्षी में विभाजन करना गलत है। लोक तंत्र में ज़रूरी है।
23. इस्लाम के अनुसार फासिक (पाप से ग्रसित व्यक्ति) को किसी आदरणीय पद का अधिकार नहीं है। लोक तंत्र में है।
24. इस्लाम में हर प्रकार के व्यक्ति से राय नहीं ली जाएगी। लोक तंत्र में हर वह व्यक्ति राय दे सकता है, जो पहचानपत्र रखता है।
25. इस्लाम के अनुसार अगर कोई लड़का बुद्धिमान, मामला को समझने वाला है तो उससे सलाह ली जा सकती है। लोक तंत्र के अनुसार पहचानपत्र की आयु का नहीं है तो उससे सलाह नहीं ली जा सकती।
26. इस्लाम में इर्तीदाद(इस्लाम से फिर जाना, धर्मविमुखता) बुराईयां, बिदअतें, गुमराहियां फैलाने पर प्रतिबंध है। लोक तंत्र में इजहारे राय के नाम पर इन सब की आजादी है।
27. इस्लाम में अवैध शारीरिक संबंध हराम है, चाहे ज़बरदस्ती से हो या सहमति से। लोकतंत्र में सहमति से हो तो जायज है।
28. इस्लाम के अनुसार संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनना हराम है, और उसके कानून मानना कुफ्र है। लोकतंत्र में सदस्य बनना भी जायज है, और उसके कानून मानना भी जायज है।
29. इस्लाम में अम्र बिल मारूफ और नह्य अनिल मुंकर ज़रूरी है। लोक तंत्र में इसकी बहुत सी सुरतें रिट को चैलेंज करती हैं।
30. इस्लाम के अनुसार चित्र निषेध है। लोक तंत्र में निर्वाचन चिन्ह के चित्र को स्वीकार करना ज़रूरी है, अपनी पार्टी का हो या दूसरी का।
31. इस्लाम के अनुसार पूरे विश्व के मुसलमान भाई-भाई हैं, एक शरीर हैं, आवश्यकता पड़ने पर उनकी हर प्रकार की सहायता करना फ़र्ज़ है। लोक तंत्र के अनुसार दूसरे देशों के आंतरिक मामलात में पड़ना जायज़ नहीं।
32. इस्लाम के अनुसार पूरे विश्व के सभी मुसलमानों का एक ही शासक होगा। लोक तंत्र के अनुसार जितने देश उतने शासक होंगे।
33. इस्लाम में जुए, सूद, सट्टा इत्यादि पर प्रतिबंध है। लोक तंत्र में कोई प्रतिबंध नहीं है।
34. इस्लाम में किसी भी नाजायज कानून का सम्मान करना कुफ्र है। लोक तंत्र के अनुसार देश के तमाम कानूनों का सम्मान करना ज़रूरी है।
35. इस्लाम में इकदामी जिहाद फ़र्ज़ है। लोकतंत्र के अनुसार हराम है
• यह है लोक तंत्र जो अपनी जात और वास्तविकता के अनुसार बदतरीन कुफ्र है।
• कुछ लोग कहते हैं राजनीति नबियों ने की थी, आप ज़रा दिल पर हाथ रखकर    बताएं, क्या नबियों की राजनीति ऐसी ही थी, जिसका हाल आप पढ़ चुके हैं। क्या कोई मुसलमान ऐसा कह सकता है?
यह मोटे-मोटे अंतर हैं, जो सामान्य लोगों को आसानी से समझ में आ सकते हैं। वैसे तो इस्लाम और लोकतंत्र (जम्हूरियत) की हर बात में तकड़ाव है। लोकतंत्र एक अलग और मुस्तकिल धर्म है। यहां मेरा उद्देश्य लोकतंत्र का पूर्ण पोस्टमार्टम नहीं है। लेकिन चूंकि निर्वाचन लोकतंत्र का एक अंग है। इसलिए आवश्यकतानुसार लोक तंत्र की खबर ली जाएगी। (अगर अल्लाह ने चाहा)
यह स्पष्ट रहे कि इस्लाम के मुकाबले में लोकतंत्र की जो धारणाएं बताई गई हैं, यह तथाकथित इस्लामी लोकतंत्र की भी धारणाएं हैं।

 

लोकतंत्र उलमा ए देवबंद की नजर में

1. मौलाना आशिक़ इलाही बुलंदशहरी रहिमहुल्लाह फरमाते हैं, “ऐसा लोक तंत्र जिसमें पूरे देश में निर्वाचन हो, वयस्क-मतदान के आधार पर हर प्रकार का व्यक्ति मतदाता हो, और मजदूर बहुमत के आधार पर फैसला रखा जाए, इस्लाम में ऐसा लोकतंत्र नहीं है। कुछ विद्वान (उलमा) भी जानबूझकर या अनजाने में इस भ्रम में हैं। और इस्लाम की बात मानने को तैयार नहीं, और कहते हैं, बड़े प्रयासों से लोकतंत्र को लाए हैं, अब उसके विरुद्ध कैसे बोलें। और उनका लाया हुआ लोकतंत्र बिल्कुल जाहिलाना(अज्ञानतापूर्ण) लोकतंत्र है। जिसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है। निर्वाचन में कोई भी कैसा ही बेदीन व्यक्ति चयनित हो जाए, जाहिली लोकतंत्र के कारण उसके पद को मानने पर विवश होते हैं, कि अब क्या करें? अब तो चयनित हो ही गया, जनता की सलाह को कैसे ठुकराएं? कानून के पाबंद हैं। उसके विरुद्ध चलने, बोलने की, और प्रयत्न करने की अनुमति नहीं। (अनवारूल बयान सुरह आल इमरान आयत सं० 159 एवं निर्वाचन की बुराई जानने के लिए देखें अनवारूल बयान सुरह माईदः आयत सं० 100)

2. मुफ्ती महमुदुल हसन गंगोही रहिमहुल्लाह फरमाते हैं, आजकल लोकतंत्र से तात्पर्य यह है, कि हर वयस्क पुरुष,महिला पढ़ा लिखा,अनपढ़ बुद्धिमान, मंदबुद्धि को मतदान का अधिकार प्राप्त हो। और बहुमत के आधार पर शासक चयनित किया जाता हो। इस्लाम में ऐसे लोकतंत्र का कहीं भी कोई अस्तित्व नहीं है। और न ही कोई बुद्धि जिवी व्यक्ति इसमें कोई सदगुण होने के बारे में सोच सकता है। (फतावा महमूदियह किताबुस सियासति वल हिजरह 4/602 दारुल इफ्ता फ़ारुकिया कराची)

3. मौलाना मो० इदरीस कांधलवी रहिमहुल्लाह फरमाते हैं। “ऐसा शासन इस्लामी शासन नहीं कहला सकता, जो शासन अल्लाह के शासन, शरियत के क़ानून की महानता, सर्वोच्चता (बरतरी) और सर्वप्रधानता को न स्वीकार करता हो, बल्कि यह कहता हो, शासन तो जनता और मज़दूरों का है। और देश का कानून वह है, जो जनता और मजदूर मिलकर बना लें। तो ऐसी हुकूमत निसंदेह काफिर हुकूमत है।
ان الحکم الا للہ و من لم یحکم بما انزل اللہ فاولئک ھم الکفرون
(अकाईदे इस्लाम पृष्ठ सं 195 इदारह इस्लामियात कराची )

4. मौलाना मंज़ूर नोमानी साहब रहिमहुल्लाह अपने शिक्षक अल्लामा शब्बीर अहमद उस्मानी रहिमहुल्लाह को एक पत्र में लिखते हैं, इस चुनाव प्रचार में मुसलमानों के धर्म व शिष्टाचार का जिस प्रकार हनन हो रहा है, दीनदारी और मानवता की जिस बुरी तरह बली दी जा रही है, दुष्टता और हिंसा के प्रत्येक गुणों का उम्मत में जिस प्रकार व्यापक रूप से विकास हो रहा है, समाचार पत्र में इसकी स्थिति पढ़-पढ़ कर, और स्थानीय परिस्थितियों को देखकर, मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति और पापी के हृदय पर भी जो कुछ गुज़र रहा है, मैं शब्दों में बताने से बेबस हूं। मैं अपने छापों और भावनाओं पर अनुमान लगाकर सपथ ले सकता हूं, कि यदि जनाब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस विश्व में पधारें, तथा हमारे इस चुनाव प्रचार और इस संदर्भ में जो कुछ हो रहा है, देखें तो वास्तव में आपको इतना भारी दू:ख पहुंचेगा, इससे पहले शायद कोई शोकपूर्ण घटना इतना दुखदायक न हुआ होगा। मेरा खयाल है, कि लाखों मुसलमानों का काफिरों की तलवारों से शहीद हो जाना, और बड़े-बड़े देशों का मुसलमानों के हाथ से निकलकर नास्तिकों(काफिरों) के हाथ में चले जाना भी रसुलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए इतना दर्दनाक नहीं था, जितना कि मुसलमान राष्ट्र का धर्म، मानवता और शिष्टाचार को छोड़कर दुष्ट और हिंसक बन जाना। (खुतबाते उस्मानी पृष्ठ सं० 214 मक्तबा दारुल उलूम कराची)

जम्हूरियत एक तर्ज़े हुकूमत है कि जिसमें
बन्दों को गिना करते हैं तौला नहीं करते
तूने क्या देखा नहीं मगरिब का जमहुरी नजाम
चेहरा रौशन अंदरून चंगेज से तारिक तर
(अल्लामा मो० इकबाल)

 

लोकतंत्र की खराबियां

1. मुद्रित चित्र के निषेध, हराम होने पर उलमा का इत्तेफ़ाक़ है। हदीस के अनुसार प्रलोक में सबसे भाड़ी दण्ड चित्र बनाने वालों को होगा। जिस घर में चित्र हो वहां इष्टदूत (फरिश्ते) नहीं आते। आज की परिस्थिति देखिए क्या हो रहा है। अन्य लोगों को छोड़िए, मौलवी महोदय क्या मानवाकार या उससे बड़ा चित्र नहीं बनवा रहे हैं। आखिर क्या विवशता (मजबूरी) है

2. क़ुरआन के अनुसार गीबत, (पीठ पीछे आलोचना करना) अपने मृत भाई का मांस खाने के समान है। हदीस के अनुसार गीबत, अवैध शारीरिक संबंध (ज़िना) से अधिक कठोर है। इस राष्ट्र में निर्वाचन के दिनों में क्या लाखों, करोड़ों गीबतें नहीं होती। क्या आप करोड़ों (ज़िना) बलात्कार सहन कर सकते हैं। यह तो बलात्कार से भी अधिक बुरा है। हजारों की भीड़ में मंच लगाकर गीबत होती है। इतना ही पर बस नहीं होता, बल्कि तालियां, सीटियां बजा कर उन गीबतों की प्रशंसा की जाती है। आप उलमा से पूछें! पाप (गुनाह) की प्रशंसा करना कुफ्र है। फिर इस मैदान में मौलवी महोदय भी किसी से पीछे नहीं हैं, वह भी मंचों पर एक दूसरे की गीबत करते हैं। और नीचे वाले अल्लाहु अकबर के नारों से उसकी प्रशंसा करते हैं। जो अन्य लोगों की तुलना में बड़ी अज्ञानता है, कि गुनाह (पापों) की प्रशंसा हेतु अल्लाहु अकबर का शब्द प्रयोग किया जाए। उस से भी बढ़कर आरोपों के बाढ़ होते हैं, और उसकी प्रशंसा होती है। अतः यह निर्वाचन ईमान-घाती एक रोग है। अपने ईमान की चिंता करें। कहीं ऐसा न हो कि प्रातः काल में हम (मोमिन) आस्तिक हों, और संध्याकाल में नास्तिक (काफिर) हों।

3. निर्वाचन घर-घर, टोला-टोला, मस्जिद-मस्जिद, ग्राम-ग्राम, घृणा, जूगुप्सा का सूत्रपात करता है। इससे पारस्परिक शत्रुता और मतभेद बढ़ती है। भाई-भाई से अप्रसन्न। भतीजा चाचा से क्रोधित, शिक्षक शिष्यों से विमुख, पिता पुत्र से क्रोधित, मस्जिदों का वातावरण दूषित, मदरसों का वातावरण बिगड़ा हुआ, इमाम मूक्तदी में मतभेद, शिक्षकों और शिष्यों में घृणा, क्या यह वास्तविकता नहीं है?

4. निर्वाचन में सरपट धन व्यय होता है, जो अपव्यय है। और क़ुरआन में ऐसों को शैतान का बंधु घोषित किया गया है।

5. निर्वाचन में झूठ बहुत फैल जाता है, झूठे वादों द्वारा व्यर्थ की आशा दिलाकर, जनता को मूर्ख बनाया जाता है। और आपके द्वारा केवल किसी एक को मतदान करना होता है, लेकिन शिष्टाचार से विवश होकर सबको कहना पड़ता है, मेरा मत आपका है, जोकि झूठ है, और सभी जनता इससे ग्रसित हैं।

6. निर्वाचन विद्वानों (उलमा) कि प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला देता है, क्योंकि लोक तंत्र कहता है, दो वैश्याएं एक शैखुल इस्लाम से अच्छी हैं। एक वैश्या और मुफ्ती, शैखुल इस्लाम बराबर हैं। इसलिए जब कोई मौलवी इस मैदान में पांव रखता है, तो सबसे पहले वह अपनी प्रतिष्ठा को अपने पांव से रोंदता है। क्योंकि वह इस पर प्रसन्न होता है, कि वह एक वैश्या बल्कि एक नास्तिक काफिर के समान हो, तो वह अन्य लोगों से अपनी प्रतिष्ठा सम्मान की क्या आशा रखता है। फिर निर्वाचन तथा राजनीति में उनसे कुछ अशुद्धियां हो जाती हैं, क्योंकि यह व्यवस्था ही अशुद्धियों का है। तो उनकी बची खुची प्रतिष्ठा भी समाप्त हो जाती है। और विद्वानों(उलमा) से जनता का भरोसा उठ जाता है।

7. निर्वाचन में अल्लाह की सबसे अच्छी संपत्ति का अपमान और (नाशुक्री) अकृतज्ञ होता है। मुसलमान अल्लाह की बड़ी संपत्ति इस्लाम का अकृतज्ञ करके स्वयं को नास्तिक के समान कर देता है। विद्वान अपने विद्या और इस्लाम जैसी संपत्ति का अकृतज्ञ करके स्वयं को नास्तिक अज्ञानी के समान कर देता है। कुलीन अपनी कुलीनता का अपमान और अकृतज्ञ करके स्वयं को निकम्मों के समान कर देता है। बुद्धिमान अपनी इश्वर्दत्त बुद्धि का उपहास करके, स्वयं को मंदबुद्धि, मूर्खों के समान कर देता है।

8. लोगों का प्रेम एवं घृणा ईमान व परहेजगारी के बजाए, दल के आधार पर होता है। यही कारण है कि वह अपने दल के हिन्दू, ईसाई, शिया इत्यादि को सफल देखना चाहते हैं, न की दूसरे दल के धर्मनिष्ठ मुसलमान आलिम को। जैसा कि आप लोगों के अवलोकन में आ रहा है, यदि यह ईमान की मृत्यु नहीं है तो क्या है? यह पक्षपात की बहुत बुरी स्थिति है, जिससे रसुलूल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने विमुखता की चेतावनी दी है। और कठोर क्रोध प्रकट किया है। और इसे अज्ञानता (जाहिलियत) घोषित की है।

9. पूंजीवाद की इस अस्वीकृत पुत्री(लोकतंत्र) के कारण निर्धन व्यक्ति अतिनिर्धन एवं धनी व्यक्ति अतिधनवान होता चला जाएगा।

10. धर्म विमुखता एवं धर्म से दूर करने के लिए किये गए प्रयासों के परिणाम में उत्पन्न होने वाले मनुष्य के इस स्वयं निर्मित व्यवस्था में इस्लाम की मंज़िल प्रत्येक अतित पल के साथ दूर से अतिदूर और कठिन से अतिकठिन होती जाएगी। और इसकी तुलना में कुफ्र शक्तिशाली से अतिशक्तिशाली होता चला जाएगा।

11. कई वंशों से लोकतंत्र में रहने के कारण लोगों की मनोदशा परिवर्तित हो गई है, कि वह धार्मिक मसाइल में भी बहुमत की ओर भागते हैं, न कि क़ुरआन व सुन्नत की ओर। अर्थात लोगों का पैमाना परिवर्तित हो गया है।

12. राष्ट्रभक्ति, देशभक्ति का प्रदूषण मुसलमानों के हृदयों को दूषित कर रहा है। इस्लाम से अधिक देश नाम की मूर्ति को पूजा जाता है। आखिर किस-किस बात को रोएं। यहां संक्षेप में लिखना मेरा उद्देश्य है, अन्यथा निर्वाचन और लोक तंत्र के प्रदूषण पर कई सौ पृष्ठों की पुस्तक लिखी जा सकती है। मेरे लिखने का उद्देश्य अपने मुसलमान बंधुओं को तौबा की दावत देनी है, कि आप सदैव के लिए लोकतंत्र और निर्वाचन से तौबा करें। और अन्य लोगों को भी समझाएं।

 

कुछ संदेह का रद

• कोई आपको यह धोखा न दे सके, कि मतदान वाजिब है। प्रत्याशियों में से अच्छे को मतदान करना ज़रूरी है। आप उनसे कह दें, कुफ्र का कोई भी भाग वाजिब और ज़रूरी नहीं हो सकता। हमें ऐसे वाजिब से बचाएं, जो हमारे ईमान पर ही आक्रमण करके, हमें ईमान से वंचित कर दे। हमें ऐसे वाजिब से दूर रखें, जो हमें कुफ्र,निफाक़, घृणा, जुगुप्सा, धोखा, गीबत, आरोप, अपव्यय के सागर में डूबा दे। हमें ऐसे वाजिब से क्षमा रखें, जो हमारे बच्चों को हमसे अंजान कर दे, जो हमारे मदरसों, मस्जिदों के वातावरण को दूषित करके ज्ञान एवं परहेजगारी को मिट्टी में मिलादे, हमें ऐसे वाजिब से क्षमा करें, जो हमें पौन शताब्दी में भी कुफ्र की गुलामी से मुक्त नहीं कर सका।

• कोई आपसे कह सकता है, कि अमुक महोदय ने फतवा दिया है, कि मतदान शहादत(गवाही) है, सिफारिश है, वकालत है, इसलिए वाजिब है। आप उनसे कहें, कि यह कैसी शहादत गवाही है, जिसमें मुस्लिम, काफिर, आस्तिक, नास्तिक, ज्ञानी, अज्ञानी, पुरुष, महिला सब समान हैं। जिसका निसाब दो पर पूरा ही नहीं होता, बल्कि हजार पर भी पूरा नहीं होता, जिसमें मुर्तद्द को भी गवाही से वंचित नहीं किया जाता। यह कैसी सिफारिश है कि अगर एक भी बढ़ जाए तो उसका स्वीकार करना ज़रूरी होता है, हालांकि नियम अनुसार सिफारिश का क़ुबूल करना ज़रूरी नहीं होता है। यह कैसी वकालत है, जिसमें वकील मुवक्किल से ज़्यादा शक्तिशाली होता है, हमें कुफ्र के छाता के नीचे कोई शहादत, गवाही, वकालत और सिफारिश क़ुबूल नहीं।

• याद रखें मदरसे, अमरीका सहित पूरी दुनिया में चल रहे हैं। इसलिए कोई आपको यह कहकर धोखा न दे सकें, हमें वोट दो, हम न होंगे तो, उसको यह होगा, वह होगा। याद रखिए कुफ्र को हमारी दो ही वस्तु से घृणा है। जिहाद एवं इस्लामी व्यवस्था।

• यह भी स्पष्ट रहे कि मर्द का मर्द से विवाह भारत जैसे प्रदूषित देश में भी नहीं हो रहा है, इसलिए कोई आपको यह कहकर धोखा न दे, कि यदि हम असेंबलियों में न होंगे, तो मर्द का मर्द से विवाह शुरू हो जाएगा।

• याद रखे मतदान द्वारा पचास हजार वर्ष में भी इस्लामी व्यवस्था नहीं लाया सकता। अतः कुछ लोकतांत्रिक दलों का यह नारा कि अल्लाह की धरती पर अल्लाह की व्यवस्था लागू करेंगे, सबसे बड़ा झूठ है। जिसकी धूल को भी विश्व का कोई और झूठ नहीं पहुंच सकता। यदि लोकतंत्र द्वारा अल्लाह की व्यवस्था लाना एक प्रतिशत भी संभव होता तो वैश्विक बदमाश उस पर भी प्रतिबंध लगा देते।

• कुछ मौलवी, आपसे कह सकते हैं, लोकतंत्र को तो हम भी कुफ्र समझते हैं, लेकिन विवशता की स्थिति में सुअर खाना भी जायज़ है, उत्तर आप विवशता की स्थिति में नहीं हैं। आप के पास हजारों मदरसों, मर्कजों, खानकाहों, के कम से कम, सत्तर, अस्सी लाख गतिशील स्वस्थ युवा हैं। और आपके पास फतवे की वह शक्ति है, जो विश्व में अन्य किसी के पास नहीं, जो तागूत के सेनाओं में भोंचाल ला कर रखदे। बस करो सुअर खाते-खाते लंबी अवधि गुज़र गई है। कब तक खाते रहोगे, सुअर का खाना तो आवश्यकतानुसार जायज़ होता है। और तुम्हारी आवश्यकता है, कि पूरी ही नहीं हो रही है। आओ सुद्ध हलाल की ओर, दावत व जिहाद की ओर। यही अल्लाह का आदेश और रसूल का उपागम है। इसी से व्यवस्था में परिवर्तन आएगा। अन्यथा हम अंधकार में भटकते रहेंगे। हम कैसे स्वीकार करें कि आप लोकतंत्र को कुफ्र घोषित करते हैं। जबकि प्रत्येक स्थान पर फैले इस कुफ्र के विरुद्ध में एक भी भाषण जनता में नहीं दिया। बल्कि अधिकांश जनता को इसके कुफ्र होने में आपके इस सम्मिलित होने और चुप रहने से संदेह है। यह कैसे संभव है, एक स्वाभिमानी आलिम किसी कार्य को कुफ्र समझे, उसे फलता-फूलता भी देखे, फिर भी चुप रहे, और अपने शिष्यों, मुकतदियों अनुयायियों पर उसका कुफ्र होना स्पष्ट न करे। आपने मिस्वाक (दांतून) के फजाइल स्पष्ट किए, प्याज खाकर मस्जिद में आने के विरुद्ध में आपने बयान दे दिया, सूरमा लगाने तक के आदाब आपने बता दिए, जो उचित है। लेकिन इस कुफ्र के विरुद्ध आपने कोई भाषण नहीं दिया, तो कैसे स्वीकार कर लिया जाए, कि आप इसे कुफ्र स्वीकार कर रहे हैं, कहीं आप तक़िया तो नहीं कर रहे हैं।

• कुछ लोग कहते हैं, आपके पास कोई विकल्प भी है। यदि यह इसलिए कहते हैं, ताकि सामने वाला चुप हो जाए, और भविष्य में लोकतंत्र के विरुद्ध न बोल सके, तो यह हृदय एवं आत्मा से इस पर इमान लाए हैं। यह अपने ईमान की चिंता करें, क्योंकि कुफ्र का दिफा कर रहे हैं। उनके नजदीक इस्लाम इस कुफ्र से श्रेष्ठ तो क्या, इसका विकल्प भी नहीं है। यदि यह सवाल वास्तविकता पर आधारित है, तो यह प्रश्न स्वयं उनसे है, क्या हमारा धर्म पूर्ण नहीं है। क्या अल्लाह ने हमें ऐसा अपमानित, दरिद्र छोड़ा है, कि हमारे पास इस बदबूदार कुफ्रिया व्यवस्था का कोई विकल्प ही न हो। क्या यह अपने धर्म का उपहास करना नहीं है। वास्तव में यह लोग कुफ्र की अंधकार में हैं, उन्हें सुझाई नहीं देता, तौबा करके प्रकाश में आएंगे, तो इन्हें स्वयं ही विकल्प भी सुझाई देने लगेगा। किसी से पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, कि कुफ्र का विकल्प नहीं मांगा जाता है। कुफ्र से तौबा की जाती है। कुफ्र को मिटाने का प्रयास किया जाता है। वैश्या को कोई अधिकार नहीं है, कि इस्लाम में 100 यारों वाला विकल्प ढूंढे। गांडू, पुरुष को विकल्प मांगने का क्या अधिकार है, तौबा करें। कहने का तात्पर्य यह है, कि पाप या कुफ्र का विकल्प ढूंढना किसी मुसलमान का काम नहीं।

 

चेतावनियां

• चुनाव चिन्ह किताब को कुरआन घोषित करना, बहुत ही भयानक एवं अश्लील बात है। बल्कि इसमें कुफ्र का डर है। क्योंकि गैर क़ुरआन को क़ुरआन कहना कुफ्र है।
• कसी भी लोकतांत्रिक झंडा को नबवी झंडा कहना, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर झूठ बांधना है, क्योंकि रसुलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी भी कुफ्र में भाग लेकर झंडा प्रयोग नहीं किया। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सिर्फ इस्लाम का झंडा प्रयोग किया, जो अधिकांश पूर्ण उजला, या पूर्ण काला होता था, और वह भी मैदाने जिहाद में। मूलत: बात यह है, कि जो लोग इस प्रकार के कार्य करते हैं, वह यह कहना चाहते हैं, कि हमारे विपक्षी क़ुरआन, और नबवी झंडे का विरोधी है।—और क़ुरआन के विरोधी कौन होते हैं, अफसोस है कि फिर उन्हीं के साथ मिलकर यह लोग सत्ताधारण करते हैं। और उनके कार्यकर्ताओं से दान लेते हैं।

मुसलमानों के मुकद्दसात (परम पवित्र स्थलों) आयोजनों ( मस्जिदों, मदरसों, और खतमे नुबूवत ख़तमे बुखारी एवं अन्य धार्मिक आयोजनों) को इस अशुभ इस्लाम-विरोधी राजनीति से दूर रखना जरूरी है। अन्यथा धीरे-धीरे मुसलमानों की एक बड़ी संख्या इन मुकद्दसात एवं दीनदार लोगों से विमुख और दूर हो जाएगी। बड़े खेद से कहना पड़ता है, कि यह बात न केवल शरियत के अनुसार ही ठीक नहीं। बल्कि बुद्धि शिष्टाचार न्याय के भी विरुद्ध है। कि इन मुकद्दसात को तो दान सब लोग दें, और उससे लाभ विशेष दल प्राप्त करें। ऐसी कार्यनीति से ऐसे भयानक परिणाम निकलेंगे, उनके ख्याल से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।*कुछ लोग उपर्युक्त सभी बुराइयों को जानते हैं, फिर भी कहते हैं, हम इसलिए सम्मिलित होते हैं, कि मैदान को ख़ाली नहीं छोड़ना चाहिए, ऐसों की सेवा में प्रस्तुत है, श्रीमान पैगंबरों (अल्लाह के संदेष्टाओं) ने सदैव कुफ्र के मैदानों को काफिरों के लिए ख़ाली छोड़ा है। यदि आपको किसी मैदान को अपनाना ही है, तो इसके अतिरिक्त भी मैदान बहुत से हैं। यहूदियत, ईसाईयत, इल्हाद, इत्यादि इन मैदानों में इस्लाम धर्म की खूब-खूब सेवा करें। प्रशंसा है आपके साहस की।

सूचना:
पहले तो आप मतदान से पूर्ण साहस के साथ स्पष्ट रूप से इंकार कर दें। लेकिन अगर आपको मतदान हेतु विवश कर ही दिया जाए, तो एक से अधिक स्थान पर मुहर लगाकर या खाली पर्ची फेंककर अपने मत को नष्ट कर दें।

लोकतंत्र, अंतिम श्वास ले रही है, मतदान करके उसकी आयु लंबा करने, और इस्लाम लागू होने में विलम्ब का कारण न बनें।

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