तहज़ीरुस सवाद – अन तगाफुलि फरीज़तिल जिहाद

तहज़ीरुस सवाद

अन तगाफुलि फरीज़तिल जिहाद

फरीज़ा ए जिहाद से आगाही

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इस्तिफ्ता (जनमत संग्रह)

अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुह

मुफ्तियाने किराम निम्नलिखित प्रश्न के बारे में क्या कहते हैं:

जिहाद का शाब्दिक अर्थ क्या है?

और शरीयत में शाब्दिक अर्थ का एतबार है या शरई अर्थ का?

क्या जिहाद की फजीलतों को किसी अन्य धार्मिक कार्य पर लागू किया जा सकता है?

वर्तमान परिस्थिति में शरई जिहाद की क्या स्थिति है? शरई जिहाद की शर्तें क्या हैं और वे मौजूद हैं, या नहीं?

कृपया कुरान और हदीस और न्यायशास्त्र(फिक्ह) की विश्वसनीय पुस्तकों के आलोक में उत्तर दें।

***

जवाब अल्लाह की तौफीक से

जिहाद की हकीकत

अल्लाह सर्वशक्तिमान ने मानव के सफलता के लिए जीवन के हर क्षेत्र में अलगअलग आदेश दिए हैं, और इसे पवित्र पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के द्वारा इस तरह समझाया है, कि इसमें और स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं है। यह अलग बात है कि यह सब आदेश बहुत से कम पढ़ेलिखे और मंदबुद्धियों को ज़माना के अनुरूप दिखाई नहीं देते। जिसके कारण वे विभिन्न आपत्तियों या व्याख्याओं के शिकार हो जाते हैं। होना तो यह चाहिए था कि वे अपने लिए जानकारी की कमी और मंदबुद्धि होने को स्वीकार करते, लेकिन क्या करें? नफ्स, शैतान, चाहत और वासना के भी अपने तकाजे हैं।

शरीयत ने इबादत के प्रत्येक कार्य के लिए अपना अलग नाम और अलग नियम निर्धारित किया है। अन्य इबादतों का परिचय तो सामान्य बात है।

जिहाद एक ऐसी इबादत है, जिसमें तीर, तलवारें, राइफलें, घोड़े, जहाज और आधुनिक समय के अनुसार पिस्तौल, कलाशिंकोफ, हथगोले, टैंक, गोलाबारूद आदि शामिल हैं। जिसके द्वारा एक मुसलमान काफिरों का सर कुचलता है, और उनकी शान को मिट्टी में मिला देता है।

यदि वह काफिरों को मारता है, तो उसे गाज़ीकहा जाता है। और यदि वह उनके द्वारा मारा जाता है, तो उसे शहीदसमझा जाता है।

काफिरों को हराने के बाद, मुसलमान उनकी संपत्ति छीन लेते हैं, और उह शुद्ध रोजी माले गनीमतकहलाता है। और अगर वे पुरुषों को जीवित पकड़ लेते हैं, तो वे उन्हें गुलामबनाते हैं। और यदि वे महिलाओं को जीवित पकड़ते हैं, तो वे उन्हें बांदीबनाकर प्रयोग करते हैं।

इन सब चीजों को अल्लाह सर्वशक्तिमान ने मुसलमानों के लिए एक इनाम के रूप में रखा है, लेकिन मुझे नहीं पता कि इस युग में मुसलमानों को इन चीजों में रूचि क्यों नहीं रही। क्या ऐसा तो नहीं है कि इस पवित्र कर्तव्य की हकीकत और महत्व को मुसलमानों से गुप्त रखा गया हो ? وإلى الله المشتكى यह तो जिहाद का संक्षिप्त परिचय था।

जिहाद का शाब्दिक और परिभाषिक अर्थ:

चूंकि जिहाद शरीयत की एक परिभाषा है, इसलिए इसका शाब्दिक और परिभाषिक अर्थ जानना और उनके बीच के अंतर को समझना बहुत जरूरी है। क्योंकि कुछ तथाकथित विचारक और मुजतहिद जो आधुनिक न्यायशास्त्रीय मुद्दों(फिक्ही मसाइल) और इस्लामी आर्थिक व्यवस्था से बहुत जुड़े हुए हैं लेकिन पता नहीं वे इस्लामी खिलाफतव्यवस्था क्यों नहीं चाहते? और सबसे बड़ा अराध्य अर्थात लोकतंत्र का प्रशंसक बनना और रहना पसंद करते हैं, इसलिए कभीकभी वह खिलाफत हासिल करने का एकमात्र उपाय को इस तरह से घायल कर देते हैं, कि जिहाद का शाब्दिक और परिभाषिक अर्थ में भेद किए बिना उनपर हुक्म लगाना शुरू कर देते हैं। और कभी पवित्र पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की भविष्यवाणियों के दायरे को सीमित करके काफिरों की खुशी को इकट्ठा करते हैं। कभी कुछ और कभी कुछ।

जिहाद का अर्थ अरबी शब्दकोश में प्रयास करनाहै।

शरीयत में जिहाद की परिभाषा

الجهاد شرعا بذل الجهد في قتال الكفار

(मिरक़ात)

आगे की व्याख्या के लिए, एक हदीस प्रस्तुत की जाती है:

हज़रत अम्र बिन अबसा कहते हैं, कि पवित्र पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया, ما الجھاد (जिहाद क्या है?)

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहाः ان تقاتل الكفار إذا لقيتهم (काफिरों से युद्ध के मैदान में लड़ना)

फिर किसी ने पूछा: فأي الجهاد أفضل؟ कौनसा जिहाद सबसे अच्छा है?

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उत्तर दिया: من اقر واده وأهريق دمه (जिसमें मुजाहिद के घोड़े का पैर काट दिया जाए, और मुजाहिद का खून खुद बहा दिया जाए)(मुसनद अहमद)

बस और क्या चाहिए? इससे अधिक स्पष्टता क्या हो सकती है? कि जिहाद का मतलब शरीयत में केवल लड़ना है। इसलिए, इसमें हेरफेर करना और इस्लामी अन्य इबादतों को जिहाद का नाम देना कुरान और सुन्नत को विकृत करने के समान है। और शरीयत की गलत व्याख्या करके उम्मत को गुमराह करना है। तर्कों और दलीलों के लिए इस विषय पर लिखी गई किताबें पढ़ें, तो आप खुद ही सच तक पहुंच जाएंगे।

व्याख्या: यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि शरीयत में, कभीकभी प्रेरणा के लिए किसी कार्य को जिहादलौकिक रूप में कह दिया जाता है। मातापिता की सेवा आदि। लेकिन उससे वह चीज़ जिहाद नहीं हो जाती।

मैं एक उदाहरण देता हूं। गर्मी में एक मजदूर बड़ी मुश्किल से रोजा रख रहा है, गर्मी तेज है, काम भी बहुत हैं, लेकिन इन सब चीजों को सहकर वह अपना व्रत पूरा कर रहा है, यह काम शरीयत में पसंदीदा है और भक्ति का तकाजा भी है। इस व्यक्ति के काम में बड़ी कठिनाई है, उसके काम को शरीयत में रोजाही कहा जाएगा। क्या कोई है जो उसे जिहाद कह दे? हो सकता है इस पर उस व्यक्ति को ऐसा सवाब मिले कि वह किसी गाजी या शहीद के पद को पार कर जाए, लेकिन उसके इस कार्य को रोजाही कहा जाएगा, न कि जिहाद

इसी तरह शरीयत की अन्य आज्ञाओं को भी समझ लें, कि भले ही उनमें कठिनाई और पीड़ा है, लेकिन उन्हें जिहाद नहीं कहा जाएगा। क्योंकि जिहाद एक अलग हुक्म है। और इन सभी हुक्मों का अपना अलग दर्जा है। हो सकता है प्रेरणा के लिए उनमें से किसी को कुरआन और सुन्नत में जिहाद का नाम दे दिया गया हो, लेकिन इस आधार पर उन सभी फजीलतों और हुक्मों को जो जिहाद अर्थात लड़ाई के लिए विशिष्ट हैं, अन्य इबादतों के साथ जोड़ दिया जाए और लोगों को जिहाद का नाम उपयोग करके वास्तविक जिहाद की तरह उस पर उकसाया जाए यह तो बड़े अन्याय का काम होगा।

जैसे कोई किसी की किसी व्यक्ति के बारे में कहता है कि वह तुम्हारे पिताके समान है, अब ऐसा नहीं है कि पिता के बारे में शरीयत में जितने भी आदेश और फजीलतें आई हैं, वे भी उसके पक्ष में सिद्ध हो जाए और यह व्यक्ति उसका ऐसा आदर करना शुरू कर दे जैसे अपने पिता का करना चाहिए, बल्कि असली पिता से मुंह मोड़ ले और कहे कि अब यही मेरा पिता है आप खुद से ऐसे व्यक्ति के बारे में फैसला करें। जो फैसला होगा वही बात उस व्यक्ति के बारे में भी होगी जो असली जिहाद से मुंह मोड़कर उसे करने वालों को संकीर्ण सोच वाला समझता है। और लौकिक जिहाद को असली कहकर उसकी सभी फजीलतें समेटने लगता है।

संक्षेप में, जिहाद केवल अल्लाह के लिए लड़ने का नाम है, अर्थात लड़ाई के मैदान में काफिरों से लड़ना, साथ ही वह कार्य जो अल्लाह के लिए लड़ने का माध्यम बनता हो और उससे किताल ही का समर्थन होता हो। चाहे जीभ से हो या कलम से या धन से (इसका विवरण विभिन्न प्रकार के जिहाद के अंतर्गत आएगा, इंशाअल्लाह)

चेतावनी: इस वास्तविक और लौकिक अर्थ को समझे बिना, कुछ कम जानकार, और (क्षमा करें) कुछ विद्वान भी विस्तार के नाम पर हुक्मों को मिश्रित कर दिए हैं, जबकि पहली तीन शताब्दियों में सहाबा ताबिईन और उसके बाद किसी न्यायविद(फकीह) या मुहद्दिस ने लड़ाई के अलावा जिहाद का कोई और अर्थ नहीं लिया है, इसलिए उन्हें इस पहलू पर विचार करने की आवश्यकता है।

हे अल्लाह हमें सत्य को सत्य दिखा, और उसका अनुसरण करने की तौफीक दे, और हमें असत्य को असत्य दिखा, और उससे बचने की तौफीक दे।

जिहाद का उद्देश्य:

अब जिहाद का उद्देश्य समझें, क्योंकि इसके साथ ही कुछ समीचीन और सुख के इच्छुक नेता उम्मत को यह कहकर धोखा देने का प्रयास करते हैं, “असल यह है कि मुसलमानों को शांति के साथ इबादत करने की छूट मिल जाए, और इस्लाम पर चलने में कोई बाधा नहीं हो, और यह प्राप्त है, इसलिए हमें अब जिहाद की जरूरत नहीं है।

उनके ऐसा कहने का कारण यह है कि या तो उन्हें पूरी इस्लामी शिक्षाओं और मनुष्य को इस दुनिया में भेजने के उद्देश्य का ज्ञान नहीं है, या यदि उनके पास ज्ञान है, तो इस अंधेपन के पीछे राजाओं की निकटता या काफिरों की खुशी प्राप्त करना छुपा है। ताकि उनके जीवन और संपत्ति सुरक्षित रहे, भले ही उनका ईमान चला जाए। अल्लाह ऐसे गद्दारों से उम्मत की रक्षा करे। आमीन।

प्रस्तावना: उद्देश्य बताने से पहले, यह समझना महत्वपूर्ण है कि जिहाद अस्थायी नहीं बल्कि एक स्थायी कर्तव्य है, जैसा कि उसका प्रमाण पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निम्नलिखित हदीस है:

الجهاد ماض منذ بعثني الله تعالى إلى أن يقاتل آخر أمتي الدجال

(सुनन अबी दाऊद)

एक हदीस में है:

الجهاد ماض إلى يوم القيامة

संक्षेप में, जिहाद क़यामत के दिन तक जारी रहेगा।

और यही बहुसंख्यक न्यायविदों का मत है, इसलिए अबू बक्र अलजसस कहते हैं:

وقال أبو حنيفة وأبو يوسف ومحمد ومالك وسائر فقهاء الأمصار:إن الجهاد فرض إلى يوم القيامة

अब जिहाद का उद्देश्य समझें

وَقاتِلوهُم حَتّى لا تَكونَ فِتنَةٌ وَيَكونَ الدّينُ لِلَّهِ

(अलबकराह आयत १९३)

इस आयत का सार यह है कि आप उनसे तब तक लड़ें जब तक कि फ़ितना खत्म न हो जाए और अल्लाह का धर्म अन्य सभी धर्मों पर हावी न हो जाए।

यहां दो चीजें हैं: एक फ़ितना का अंत है और दूसरा इस्लाम धर्म का वर्चस्व है। (फ़ित्ना का अर्थ इब्न अब्बास आदि से शिर्क नकल किया गया है)

इसलिए जिहाद का उद्देश्य हुआ इस्लाम का वर्चस्व और कुफ्र और बहुदेववाद का अंत।

अगरचे पूर्णतः यह लक्ष्य न्याय के दिन के निकट ईसा अलैहिस्सलाम के हाथों से प्राप्त होगा, लेकिन चूंकि यह काम जारी रखना उम्मत की जिम्मेदारी है, ताकि बातिल नियंत्रण में रहे। और सिर उठाने की कोशिश न करे।

इसीलिए फुकहा (न्यायविदों) ने जिहाद के उद्देश्य को इस प्रकार बताया है:

ونوع هو فرض على الكفاية إذا قام به البعض سقط عن الباقين لحصول المقصود وهو كسر شوكة المشركين وإعزاز الدين

(अलमबसूत सरखसी)

وإنما فرض لإعزاز دين الله ودفع الشر عن العباد

(हिदाया)

[ولأن ما فرض له الجهاد وهو الدعوة إلى الإسلام، وإعلاء الدين الحق، ودفع شر الكفرة وقهرهم.](بدائع الصنائع)

(बदाइउस सनाइअ)

इन इबारतों का सारांश, यदि दो शब्दों में किया जाए, तो यह होगा कि जिहाद का उद्देश्य दमन को दूर करना और कुफ्र(अविश्वास) की महिमा को तोड़ना है।

आइए हम यहां यह बताते चलें कि जो लोग शांति और सुरक्षाको अपना लक्ष्य मानते हैं और लोगों को इसी का विश्वास दिलाते हैं (इस कारण से, कुफ्रिया बहुदेववादी गणराज्य की व्यवस्था उन्हें स्वीकार्य है)। वह मबसूत सरखसी की यह इबारत और अन्य पुस्तकों की इस जैसी इबारतों को पेश करते हैं:

والمقصود أن يأمن المسلمون ويتمكنوا من القيام بمصالح دينهم ودنياهم“[

जिसका सारांश यह है कि, लक्ष्य शांति और सुरक्षा प्राप्त होना है ताकि मुसलमान अपनी धार्मिक और सांसारिक आवश्यकताओं का पालन कर सकें।

इस इबारत से इस गलत धारणा को सिद्ध करना एक खुला धोखा है, इसका कारण यह है कि इन वाक्यांशों की एक पृष्ठभूमि है। यानी सामान्य परिस्थितियों में जिहाद फर्जे किफाया है, आवश्यकता अनुसार लोग इसको करते रहें तो सबके जिम्मे से जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी।

इसकी दलील में न्यायविद(फुकहा) यह कहते हैं कि जिहाद का उद्देश्य तो यह है कि मुसलमान शांति और सुरक्षा के साथ अपनी धार्मिक और सांसारिक जरूरतों को पूरा कर सकें, क्योंकि अगर जिहाद हर समय हर व्यक्ति पर अनिवार्य रहे, तो जीवन के मामले सुचारू रूप से नहीं चलेंगे।

तो इस इबारत का उद्देश्य जिहाद का उद्देश्य की व्याख्या करना नहीं है, बल्कि सामान्य परिस्थितियों में जिहाद के फर्जे किफाया होने की हिक्मत बताना है। इसलिए, इस संदर्भ को ध्यान में रखें, कोई भी डेमोक्रेट आपको धोखा नहीं दे सकता।

जिहाद के प्रकार और अहकाम:

जिहाद फी सबीलिल्लाह के दो प्रमुख प्रकार हैं:

1- रक्षात्मक जिहाद

2- इकदामी जिहाद

रक्षात्मक जिहाद:

यदि किसी क्षेत्र में काफिर आक्रमण करते हैं, तो वहां के मुसलमानों पर फर्ज है कि अपना बचाव करें, यह फर्ज एक निश्चित कर्तव्य(फ़र्ज़ ऐन) है, इसलिए महिला पति की अनुमति के बिना, पुत्र मातापिता की सहमति के बिना भी बाहर निकलकर, काफिरों से लड़ेगा।1

यदि उस क्षेत्र के मुसलमान संख्या या संसाधनों की कमी या आलस के कारण अपना बचाव करने में असमर्थ हैं, तो आसपास के क्षेत्र के लोग अपनी हैसियत के अनुसार आवश्यकता के अनुसार उनकी सहायता करें। उसी तरह अल अकरब फलअकरब नियमानुसार हर मुसलमान पर यह नमाज़, रोज़े की तरह फर्ज हो जाएगा।

जैसाकि दुर्रे मुख्तार में है:

وإياك أن تتوهم أن فرضيته تسقط عن أهل الهند بقيام أهل الروم مثلا بل يفرض على الأقرب فالأقرب من العدو إلى أن تقع الكفاية فلو لم تقع إلا بكل الناس فرض عينا كصلاة وصوم ومثله الجنازة والتجهيز وتمامه في الدرر.](الدر المختار(

यह हुआ रक्षात्मक जिहादयहाँ रुकें और ईमानदारी से सोचें:

क्या इस युग में हर क्षेत्र के मुसलमानों पर यह जिहाद फर्ज नहीं है?

क्या फिलिस्तीन और सीरिया, लीबिया और लेबनान और कश्मीर और अफगानिस्तान के मुसलमान अपनी रक्षा के लिए काफी हैं?

क्या हमें उनकी मदद नहीं करनी चाहिए?

क्या हम एक फर्ज छोड़ने के अपराधी हैं?

जिहाद के फर्ज ऐन होने की परिस्थितियां।

पहली स्थिति: तो यह वही है जो ऊपर बताया गया।

दूसरी स्थिति: यह है कि यदि मुसलमानों के इमाम किसी अभियान के लिए सार्वजनिक निकलने की घोषणा करे, या किसी विशेष समूह को जिहाद के लिए नियुक्त करदे, तो उन पर जिहाद फर्ज होगा।

तीसरी स्थिति: यह है कि यदि कोई व्यक्ति जिहाद की कसम खाता है, तो उस व्यक्ति पर जिहाद फर्ज होगा।

चौथी स्थिति: यह है कि यदि कोई व्यक्ति युद्ध के मैदान में पहुंच जाए तो उस पर जिहाद फर्ज होगा, क्योंकि फर्ज किफाया शुरू करने से वह फर्ज ऐन हो जाता है।2

दलीलें

قلت: يعني أنه يكون فرض عين على من يحصل به المقصود وهو دفع العدو فمن كان بحذاء العدو إذا لم يمكنهم مدافعته يفترض عينا على من يليهم، وهكذا كما سيأتي، ولا يخفى أن هذا عند هجوم العدو أو عند خوف هجومه وكلامنا في فريضته ابتداء، وهذا لا يمكن أن يكون فرض عين إلا إذا كان بالمسلمين قلة والعياذ بالله تعالى بحيث لا يمكن أن يقوم به بعضهم، فحينئذ يفترض على كل واحد منهم عينا تأمل

(रद्दुल मुहतार)

1: إلا أن يكون النفير عاما فحينئذ يصير من فروض الأعيان لقوله تعالى: {انفروا خفافا وثقالا [التوبة: من الآية٤١

(हिदाया)

فإن هجم العدو على بلد وجب على جميع الناس الدفع تخرج المرأة بغير إذن زوجها والعبد بغير إذن المولى لأنه صار فرض عين وملك اليمين ورق النكاح لا يظهر في حق فروض الأعيان كما في الصلاة والصوم

(हिदाया)

इकदामी जिहाद:

और अगर मुसलमान काफिरों के सभी प्रकारों के उत्पीड़नो और साजिशों से सुरक्षित हों, तब मुसलमानों के लिए काफिरों पर हमला करना फर्जे किफाया है, जिसकी फुकहा के कथन अनुसार न्यूनतम राशि एक वर्ष है। यह इकदामी जिहाद है।

उपरोक्त व्याख्या से सिद्ध होता है कि जिहाद कभी भी फर्ज से कम नहीं रहता है।

इब्ने आबिदीन कहते हैं:

و لیس بتطوع اصلا

(रद्दुल मुहतार)

इसलिए, कुछ लोगों का कहना कि यदि काफिर किसी क्षेत्र में मुसलमानों पर हमला करें, तो उस क्षेत्र के मुसलमानों के लिएजायज हैकि उनसे अपनी रक्षा के लिए लड़ें।एक धोखा और जिहाद जैसे फर्ज से ला परवाही का सर्वोच्च उदाहरण है।

फर्जे किफाया होने का अर्थ:

इसे समझाने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि एक वर्ग इस तरह निकला कि वे जिहाद को बिना किसी तावील के समझा, जिहाद के फर्ज होने को स्वीकार किया, लेकिन चूंकि उन्हें खुद नहीं करना था, इसलिए वह लोग यह कहकर पीछे हट गए कि इस समय जिहाद फ़र्जे किफाया है।, इसलिए यदि एक समूह इस फर्ज को निभा रहा है, तो बाकी लोगों की ओर से दायित्व समाप्त हो गया, उन्हें धर्म के अन्य फर्जों और आदेशों पर ध्यान देना चाहिए।

जब आप फर्जे किफायाकी परिभाषा को समझेंगे तो आपको स्वतः ही पता चल जाएगा कि उनकी यह बात कितनी सही है। और यदि आप इसके शिकार हैं, तो आपको मस्तिष्क की खिड़कियां भी खुलती हुई महसूस होंगी। इनशाअल्लाह।

फर्जे किफायाहोने का अर्थ है, कि प्रत्येक व्यक्ति इस आदेश को करने के लिए फर्जे ऐन ही की तरह संबोधित है, लेकिन चूंकि एक निश्चित मात्रा इसे पूरा करने के लिए काफी होती है, इसलिए फर्जियत सभी की जिम्मेदारी से खत्म हो जातीहै। यहाँ दो बातें हैं: एक किफायत की प्राप्ति, दूसरी उसके कारण दायित्व का पतन(जिम्मेदारी का खात्मा), इसलिए जब तक कोई मात्रा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए काफी नहीं होगी, तब तक और लोगों से दायित्व का पतन नहीं होगा। खुद किफाया और सुकूत के शब्द से एक समझदार व्यक्ति थोड़ा सा विचार करने के बाद समझ सकता है, हाँ, जिसे नहीं समझना हो, तो बात और है।

मुग़नी में अल्लामा इब्न कुदामाह कहते हैं:

]فالخطاب في ابتداءه يتناول الجميع كفرض ثم يختلفان في أن فرض الكفاية يسقط بفعل بعض الناس له وفرض الأعيان لا يسقط عن أحد بفعل غيره[

(अलमुगनी)

अल्लामा अबू बक्र जस्सास लिखते हैं।

]فإن قام بفرض الجهاد من فيه كفاية وغنى فقد عاد فرض الجهاد إلى حكم الكفاية[

(अहकामुल कुरआन)

उम्मीद है, इन सब बातों से, सच्चाई दिन के उजाले की तरह आपके लिए स्पष्ट हो गई होगी। अब फैसला आप पर है कि तथाकथित मार्गदर्शकों की मानें या शरीयत की मानें

नोट: ये सभी दलीलें यह भी बताते हैं कि जिहाद जीवन में एक बार फर्ज नहीं है। क्योंकि इसका कारण काफिरों के उत्पीड़न का अंत या अल्लाह के हुक्मों का बोल बाला करना है और जब भी यह कारण पाया जाता रहेगा। जिहाद की फर्जियत लागू होती रहेगी।

फर्जे किफाया जिहाद अदा करने की सुरतें:

फर्जे किफाया अदा करने के संबंध में फुकहा की सभी इबारतों का सारांश यह है कि इसकी कुछ शक्लें हैं:

पहली सूरत:- यह है कि दारुलइस्लाम की सीमाओं पर एक गुट मौजूद हो, जो काफिरों के हमलों को रोकें और उन्हें भय की स्थिति में रखें। इसी को शरीयत में रिबात कहा गया है। और इसके संबंध में बहुत सी फजीलतें आई हैं। अगर सीमाओं पर मौजूद मुजाहिदीन पर्याप्त(काफी) नहीं हों, तो दारुल इस्लाम के नागरिकों के लिए आवश्यकता अनुसार उनका पूर्ण सहयोग करना जरूरी है।

दूसरी सूरत:- यह है, कि उसके साथसाथ मुसलमानों के इमाम को चाहिए कि, भले ही मुसलमान शांति का जीवन जी रहे हों, और काफिरों के आक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित हों, लेकिन साल में एक बार वे काफिरों के देश पर आक्रमण करते रहें, और उनकी महिमा को और उनको आगे बढ़ने से रोकें, ताकि वे अपनी अवकात को याद रखें। और मुसलमानों के खिलाफ साजिशें करने, एकजुट होने और आक्रमण करने के बारे में सोचना भी बंद कर दें।

तीसरी सूरत:यह है कि अगर कोई सांप अपना सिर बाहर निकाल रहा हो, तो इमाम को साल में एक से अधिक बार भी सुई लगा देनी चाहिए ताकि भ्रष्ट पदार्थ का बल समाप्त हो जाए।

दलीलें

1:अल्लामा इब्ने आबिदीन शामी लिखते हैं।

﴿ أَوَلا يَرَونَ أَنَّهُم يُفتَنونَ في كُلِّ عامٍ مَرَّةً أَو مَرَّتَينِ ثُمَّ لا يَتوبونَ وَلا هُم يَذَّكَّرونَ [التوبة 9:126] –

فيجب على الإمام أن يبعث سرية إلى دار الحرب كل سنة مرة أو مرتين

(रद्दुल मुहतार)

2 : मुगनी में इब्ने कुदामा लिखते हैं:

وإن دعت الحاجة في العام أكثر من مرة وجب لأنه فرض كفاية فكان على حسب الحاجة.

3 :अहकामुल कुरआन में इमाम जस्सास लिखते हैं:

ومعلوم في اعتقاد جميع المسلمين أنه إذا خاف أهل الثغور من العدو ولم تكن فيهم مقاومة فخافوا على بلادهم وأنفسهم وذراريهم أن الفرض على كافة الأمة أن ينفر إليهم من يكف عاديتهم عن المسلمين وهذا لا خلاف فيه بين الأمة.

समापन:

इस शीर्षक के अंत में जिहाद के तीन उपप्रकारों का उल्लेख करना उचित होगा। जैसा कि मैंने इसका संक्षेप में पहले उल्लेख किया है, “हर वह काम जो लड़ाई और मुकातिलीन को मजबूत करता हो और उसका समर्थन करता हो, उसे भी जिहाद कहा जाएगा।

इस संबंध में, फुकहा ने जिहाद के तीन और प्रकार बताए हैं:

1- जिहाद बिल माल (धन से जिहाद)

2- जिहाद बिल लिसान (जीभ से जिहाद)

3- जिहाद बिल कलम (कलम से जिहाद)

1:”धन के साथ जिहादका अर्थ है कि एक मुसलमान के धन का उपयोग जिहाद और मुजाहिदीन के लिए किया जाए और इस से सीधे युद्ध के मैदान में मुजाहिदीन को लाभ पहुंचे।

2:जीभ से जिहादका अर्थ है कि एक उग्र वक्ता मुसलमानों को मैदान में जिहाद करने पर उभारे, और उन्हें अनुनयविनय के माध्यम से मुजाहिदीन का समर्थन करने के लिए राजी करे, साथ ही वह व्यक्ति जो जिहाद और मुजाहिदीन के बारे में लोगों का जेहन बनाए। और युद्ध के मैदान का मार्ग प्रशस्त करे और वह कविताएँ जिनको सुनकर व्यक्ति जोश और उत्साह से भर जाए, भी जीभ द्वारा जिहाद की श्रेणी में शामिल होगा।

3:कलम से जिहादजीभ द्वारा जिहाद ही की तरह है, जिसमें कोई व्यक्ति लिखित रूप में जिहाद के लिए उकसाए। या उनके बारे में आपत्तियों और शंकाओं को दूर करे।

कहने का तात्पर्य यह है, कि हर वह काम जिससे जिहाद और मुजाहिदीन को सीधे लाभ पहुंचे जिहाद की धन्य श्रेणी में शामिल होगा।

दलीलें

1:

﴿ انفِروا خِفافًا وَثِقالًا وَجاهِدوا بِأَموالِكُم وَأَنفُسِكُم في سَبيلِ اللَّهِ ذلِكُم خَيرٌ لَكُم إِن كُنتُم تَعلَمونَ

2:

وعن أنس رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال جاهدوا المشركين بأموالكم وأنفسكم وألسنتكم

(सुनन अबी दाऊद)

3:

من جهز غازيا فقد غزا ومن خلّفه في أهله بخير فقد غزا

(बुखारी और मुस्लिम)

4:

]والتحقيق أن جنس الجهاد فرض عين إما بالقلب وإما باللسان وإما باليد فعلى كل مسلم أن يجاهد بنوع من هذه الأنواع[

(जादुल मआद)

उपरोक्त विवरण से पता चल गया होगा, कि पैसे से जिहाद, जीभ से जिहाद और कलम से जिहाद का वास्तविक अर्थ क्या है?

इसीसे आप उन लोगों के बारे में फैसला कर सकते हैं, जो अपने धन को अन्य धार्मिक और अन्य गतिविधियों में खर्च करने को धन के साथ जिहाद कहते हैं। और किसी भी धार्मिक प्रयास, प्रयत्न के लिए कलम उठाने या जीभ चलाने को जीभ और कलम का जिहाद कहकर किस इफरात और तफरीत में उम्मत को फंसा रहे हैं।बुद्धिमान के लिए बस इशारा काफी है।

जिहादेअकबर और जिहादेअसगर का फलसफा

अब

رجعنا من الجہاد الاصغر الی الجہاد الأکبر

वाक्य की वास्तविकता को समझें, क्योंकि जब राष्ट्र, कौम गिरावट से ग्रसित होती है, तो उनकी जीभ पर गिरावट के शब्द बनने लगते हैं और उनके दिल गिरावट के विचार बुनने लगते हैं। और ऐसी राष्ट्र खुद अपने विनाश की योजना बनाती है। उसका उदाहरण यह वाक्य है जो हदीस के नाम से लोगों में प्रचलित किया गया, ताकि इस्लाम के दुश्मनों से मुसलमानों का ध्यान हटाकर, उन्हें अपने जीवन का दुश्मन बना दिया जाए।

दलीलें:

1. मुल्ला अली कारी रहिमहुल्लाह ने इस वाक्य को अपनी पुस्तक मौजुआते कुबरा में लिखा है।

2. हाफिज इब्न हजर का कहना है, कि यह हदीस जुबान पर चढ़ी हुई है, हालांकि यह इब्राहिम बिन अबला नाम के शख्स का कथन है।

3: यह इब्न तैमियाह के संदर्भ से तालिकुससबीह में लिखा गया है: هذا الحديث لا اصل له

4. साथ ही फतावा अज़ीज़ी में, शाह अब्दुल अज़ीज़ ने इस हदीस का विस्तृत उत्तर लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि यह कथन सूफ़ियों की कई पुस्तकों में पाया जाता है, और यह एक सूफ़ी की राय हो सकती है, लेकिन यह हदीस नहीं है। उन्होंने अपनी दलीलों का उल्लेख किया है (विवरण के लिए, फतावा अज़ीज़ी देखें)

यहाँ कुछ इबारतें देखिए!

1: इमाम इब्ने तैमिया लिखते हैं।

أما الحديث الذي يرويه بعضهم أنه قال في غزوة تبوك: رجعنا من الجهاد الأصغر، إلى الجهاد الأكبر فلا أصل له، ولم يروه أحد من أهل المعرفة بأقوال النبي وأفعاله

(मजमूउल फतावा इब्ने तैमिया)

2:

هو مشهور على الألسنة، وهو من كلام إبراهيم بن عبلة

(तसदीदुल कौस फी तखरीजि मुस्नादिल फिरदौस)

जिहाद की शर्तें:

अंत में जिहाद की कुछ शर्तें लिखी जा रही हैं, लेकिन उससे पहले यह बात ध्यान में रखें कि ये सभी शर्तें इकदामी जिहाद के लिए हैं, रक्षात्मक जिहाद के लिए नहीं हैं। और उपर्युक्त व्याख्या से यह बात स्पष्ट हो गई होगी, जिन क्षेत्रों में कुफ्फार हमले कर रहे हैं उनपर मूलतः और बाकी उम्मत पर उनके माध्यम से रक्षात्मक जिहाद फर्जे ऐन हो चुका है। इस स्पष्टीकरण की आवश्यकता इसलिए हुई क्योंकि इस मामले में भी कुछ लोगों ने आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय जिहाद की शर्तें नहीं पाई जा रही हैं, इसलिए जिहाद फर्ज नहीं है।

वास्तव में, ये सब बातें गुलाम अहमद कादियानी के अपवित्र अस्तित्व के बाद पैदा हुई हैं। और अगर आप इस शापित व्यक्ति की विभिन्न किताबों और इबारतों को पढ़ेंगे, तो आप खुद समझ जाएंगे, कि जो लोग इन दिनों जिहाद के संबंध में विभिन्न प्रकार की बातें करते हैं, वह जानेअनजाने में किनके अनुयायी बन रहे हैं, और किनकी विचारधारा अपना रहे हैं?

इस बात का सबूत और तथ्य कि यह सभी शर्तें इकदामी जिहाद के लिए हैं, अबू बसीर और अबू जंदल रजियल्लाहु अन्हुमा का वाकिया है, बुखारी में जिसका ज़िक्र है।

और एक तर्कपूर्ण दलील यह भी है कि यदि जिहाद के लिए इस्लामीसरकार, केंद्र आदि की शर्तें थोपी गईं, तो मामला जटिल हो जाएगा। क्योंकि जिहाद का उद्देश्य इस्लामी खिलाफत की स्थापना करना है। और यदि इसे ही जिहाद की शर्त बना दिया जाए, तो मंतिक और फलसफा की परिभाषा में दौर और निरंतरता पेश आएगा जो अमान्य है।

एवं संख्या आदि की शर्त लगाना खुद ऐतिहासिक घटनाओं के विरुद्ध है। और यह अभी भी देखा जा सकता है, कि एक ओर कुछ निहत्थे अफगान और दूसरी ओर 42 देशों के गठबंधन, युद्ध की शुरुआत में कुछ मूर्खों ने अल्लाह के इन बंदों पर यह टिप्पणी की, “इनका इतनी विरुद्ध शक्तियों से मुकाबला करना भावना और दूरदर्शिता की कमी पर आधारित है।समय के साथ, यह स्पष्ट हो गया कि कौन उच्च दिमाग वाला और दूरदर्शी है। और कौन कम दिमाग वाला और अदूरदर्शी है।

असल बात यह है, कि जिन्हें काम करना हो, वे काम करने के बहाने ढूंढते हैं। (अल्लाहुम्मजअल्ना मिनहुम) और जिन्हें नहीं करना है, वे कारणों के बावजूद, विभिन्न तरीकों से इससे बचने की कोशिश करते हैं। (ऐ अल्लाह हमें इनमें से न बना)

फुकहा ने इकदामी जिहाद के फर्ज होने के लिए कुछ शर्तें बताई हैं:

मुसलमानों की संख्या इतनी अधिक हो कि जिससे महिमा उत्पन्न हो।

2- पूरी जमात का खर्चा का भी प्रबंध हो।

2- मुस्लिम समुदाय का एक ऐसा अमीर हो, जो उनकी शक्ति को एक केंद्र पर केंद्रित कर सके, और यह शर्त जिहाद के लिए आत्मा की तरह है।

3- मुसलमानों के लिए कोई ऐसा सुरक्षित और संरक्षित केंद्र भी होना चाहिए जहां कोई भी काफिरों की बुराइयों से छुटकारा के लिए, और जरूरत के समय वहां शरण ले सके।

4- मुसलमानों को जीत की उम्मीद हो।यदि पक्की राय यह हो, कि काफिरों की जीत होगी और मुसलमानों की हार होगी, तो इकदामी जिहाद फर्ज नहीं होगा।

(फतवा अब्दुल है) और (इस्लाम और सियासत)

उम्मत का एक समूह इस हदीस में वर्णित नफ्स से जिहादको लेकर धोखा देने की कोशिश करता है कि असल आत्मा का जिहादहै और अपने तर्क में यह हदीस पेश करता है, कि अलमुजाहिदु मन जाहद नफ्सहऔर एक और वाक्य हदीस के नाम पर पेश करता है, पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक युद्ध से लौटने पर कहा: رجعنا من الجهاد الاصغر الى الجهاد الاكبر इन सभी बातों की वास्तविकता यह है, कि या तो जानकारी की कमी है, या लाभों की प्राप्ति के लिए जान बूझकर अंजान बनना।

अरबी का नियम यह है कि बामाध्यम के लिए प्रयोग होता है; अर्थात जिस पर बा का प्रवेश होता है उसी के द्वारा कर्ता अपनी क्रिया करता है। इसलिए जिहाद बिन नफ्स का अर्थ होगा नफ्स के द्वारा जिहाद करना। अर्थात स्वयं से जिहाद में भाग लेना। उसी प्रकार जिहाद बिल लिसान और जिहाद बिल कलम का अर्थ है कलम या जीभ के द्वारा जिहाद करना। इसी तरह, हम जिहाद बिस सैफ, जिहाद बिस सनान, जिहाद बिल बुन्दुकिया आदि कह सकते हैं।

यह आश्चर्य की बात है कि लोग जिहाद बिल लिसान और जिहाद बिल कलम का अनुवाद और व्याख्या नियमों के अनुसार करते हैं, क्योंकि वहां उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त हो रहा है कि आप जो काम भी करें, उसे जीभ या कलम का जिहाद नाम दे दें लेकिन यहां आकर नियम मस्तिष्क से निकल जाता है। और पैर फिसल जाता है। कोई बात नहीं, हमने याद दिला दिया और समझाया, मुझे उम्मीद है कि बात समझ में आ गई होगी।

अब बात करते हैं अलमुजाहिदू मन जाहद नफ्सह की। तो, पहले पूरा वाक्य देखें। अब्दुल्ला बिन मुबारक ने इस हदीस को अपनी पुस्तक में लिखा है المجاهد من جاهد نفسه بنفسه। जिसका सीधा साधा अनुवाद होगा मुजाहिद वह है जो अपने नफ्स के द्वारा अपने नफ्स के विरुद्ध जिहाद करे।

पहले तो यह काम किया कि इस हदीस के आखिरी भाग को छोड़ दिया, क्योंकि नफ़्सयहाँ दो बार आया था, इसलिए कोई समझ सकता था कि इसका जो अर्थ बताया जा रहा है, उसका यह मतलब नहीं है, तो हकीकत खुल जाती। और बात बिगड़ जाती। इसलिए सावधानी पहले ही बरत लिया गया। लेकिन क्या करें? पवित्र पैगंबर ने खुद कहा था कि जिहाद कयामत के दिन तक जारी रहेगा, और एक समूह कयामत के दिन तक इस फर्ज को निभाता रहेगा। इसलिए उन हक वालों के रक्षक और समर्थक भी निश्चित रूप से होंगेइसलिए रहस्यों के उजागर होने में देर नहीं लगी अब इस वाक्य के वास्तविक अर्थ की ओर आते हैं।

अनुवाद से कुछ बातें समझ में आ गई होंगी, कि दो चीजें हैं: स्वयं के द्वारा जिहाद करना और स्वयं के विरुद्ध जिहाद करना।अगर इसका अर्थ वही लिया जाए जो लोग लेते हैं, तो बात थोड़ी जटिल हो जाती है और एक ही वस्तु फाइल और मफऊल दोनों बन जाता है, क्योंकि यहाँ नफ़्स को एक उपकरण बनाया गया है, और जिस तरह काम करने वाला कर्ता होता है उसी तरह, वह उपकरण भी कर्ताके क्रम में होता है जिसके द्वारा वह क्रिया कर रहा है, इसलिए नफ़्सकर्ता बन गया और नफ़्समफऊल भी है। क्योंकि इसके खिलाफ जिहाद करने के लिए कहा जा रहा है। और एक ही वस्तु का एक ही समय में फाइल और मफऊल दोनों होना असंभव है। इसलिए इसका वही अर्थ लेना आवश्यक है, जिससे बात सही हो जाए, और पैगंबर का अर्थ स्पष्ट हो जाए।

यहाँ कहने का तात्पर्य यह है, कि इस नफ्स को काफिरों के साथ जिहाद में इस्तेमाल किया जाए, यानी एक व्यक्ति को खुद इसमें भाग लेना चाहिए। इससे नफ्स की मुखालाफत और नफ्स की कुराबनी खुद बखुद हो जाएगी। इसलिए कि नफ्स को मारने और उसकी मुखालाफत की असल यही है कि अपने जीवन और संपत्ति सब को खतरे में डाल दिया जाए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। तो यह स्पष्ट हो गया कि नफ्सकुशी के नाम पर, जमीर फरोशी चल रही है, इसलिए धैर्यके नाम पर सभी अत्याचारों को सहन किया जा रहा है। और उसी की शिक्षा देकर उम्मत को और अधिक कायरता के लिए आमंत्रित किया जा रहा है।

मौलाना गंगोही अलकोकबूददुर्री में लिखते हैं:

[ولا يخفى مابين الجهادين من الالتئام والاتصال فإن مجاهدة الكفار لا تخلو عن مجاهدة النفس ولا تتصور دونها ومجاهدة النفس إذا كملت لا تكاد تترك الرجل لا يجاهد الكفار بلسانه أو بسنانه.

नोट: एक बात का ध्यान रखें कि ये सभी विवरण और उत्तर उस व्यक्ति के लिए हैं, जो इन सभी हदीसों को जिहाद से बचने के लिए पिछले दरवाजे के रूप में उपयोग करता है। अन्यथा महान देवबंदी उलमा भी इसे आत्मा का संघर्ष, शुद्धि और दुर्गुण दूर करने के बाब में बयान करते हैं, लेकिन उनका मकसद कुछ और होता है.

विचार का क्षण:

इस किए गए बहस के बाद आपका दायित्व है, कि आप खुद फैसला करें कि आजकल जिहाद का क्या हुक्म है?

और क्या हम उस आदेश का पालन कर रहे हैं?

सारांश यह है कि आज सभी मुसलमान रक्षात्मक जिहाद की स्थिति में हैं, इकदामी जिहाद तो आज हमारे लिए एक सपना बनकर रह गया है। क्योंकि कश्मीर, फिलिस्तीन आदि क्षेत्र जहां काफिरों का नियंत्रण है, वहां के लोगों के लिए जिहाद के फर्जे ऐन होने में कोई संदेह नहीं है। और यह पूरी उम्मते मुस्लिमा पर भी फर्जे ऐन है, भले ही वे तथाकथित इस्लामी सरकार के अधीन रह रहे हों, क्योंकि पराजित मुसलमान काफिरों के मुकाबला में काफी नहीं हैं, चाहे संख्या और संसाधन की कमी के कारण से हो, या आलस बरतने के कारण से हो, इसलिए, अलअकरब फल अकरब नियमानुसार, सभी मुसलमानों पर जिहाद की फर्जियत सिद्ध हो चुकी है।

जरा सोचिए, यह सब जिहाद से बचने के लिए दुष्प्रचार किया जा रहा है। और जिन फुकहा की इबारतों से हम पर जिहाद की हकीकत स्पष्ट हुई है, उन्हीं को तोड़मरोड़ कर जिहाद से बचने के लिए रास्ते खोजे जा रहे हैं। क्या यह न्याय है?

क्या फुकहा के किताबुससियर और किताबुलजिहाद आदि लिखने का मंशा यही था?

कृपया अपनी विचारधाराओं को सुधारें और अपने कार्यों तथा जिहाद और मुजाहिदीन के प्रति अपने दृष्टिकोण का जायजा लें, कि आज हम सामूहिक रूप से उस फर्ज को छोड़ रहे हैं, जो ईश्वर के वचन की महानता और धर्म के सम्मान का साधन है। विचार कीजिए! आज उम्मत जिन परेशानियों से पीड़ित हैं, इसका कारण यही सामूहिक अपराध तो नहीं हैं?

प्रकृति लोगों के व्यक्तिगत गलती को तो क्षमा करती है,

देश के सामूहिक पापों को कभी माफ नहीं करती।

हाँ, यही अपराध है! यही अपराध है!

क्योंकि पवित्र पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा था:

यह समय निकट है कि काफिर कौमें एक दूसरे को तुम्हारे खिलाफ लड़ने के लिए इस तरह आमंत्रित करेंगे, जैसे भूखे एक दूसरे को मेज पर आमंत्रित करते हैं। एक पूछने वाले ने पूछा क्या उस समय ऐसा हमारी संख्या कम होने के कारण से होगा? नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा: नहीं, तुम उस समय बड़ी संख्या में होगे, लेकिन तुम बाढ़ के झाग की तरह होगे। और अल्लाह निश्चित रूप से तुम्हारे दुश्मनों के दिलों से तुम्हारे खौफ को दूर करेंगे और तुम्हारे दिलों में कमजोरी डाल देंगे। प्रश्नकर्ता ने पूछाः ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! यह कमजोरी क्या होगी? पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा: इस दुनिया से प्यार करना और मौत को नापसंद करना।

एक अन्य रिवायत में ये शब्द भी मिलते हैं: सहाबा रजियल्लाहु अन्हुम अजमईन ने पूछा: हे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! यह कमजोरी क्या है? नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: अपनी दुनिया से प्यार करना और काफिरों से लड़ना नापसंद करना।

عن ثوبان قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : ” يوشك الأمم أن تداعى عليكم كما تداعى الأكلة إلى قصعتها “. فقال قائل : ومن قلة نحن يومئذ ؟ قال : ” بل أنتم يومئذ كثير، ولكنكم غثاء كغثاء السيل، ولينزعن الله من صدور عدوكم المهابة منكم، وليقذفن الله في قلوبكم الوهن “. فقال قائل : يا رسول الله، وما الوهن ؟ قال : ” حب الدنيا وكراهية الموت

“(सुनन अबी दाऊद)

عن أبي هريرة ، قال : سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لثوبان : ” كيف أنت يا ثوبان إذا تداعت عليكم الأمم كتداعيكم على قصعة الطعام تصيبون منه “. قال ثوبان : بأبي وأمي يا رسول الله، أمن قلة بنا ؟ قال : ” لا، بل أنتم يومئذ كثير، ولكن يلقى في قلوبكم الوهن قالوا : وما الوهن يا رسول الله ؟ قال : ” حبكم الدنيا، وكراهيتكم القتال

(सुनन इब्ने माजा)

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने खुद कह दिया कि चूंकि तुम जिहाद को नापसंद करने लगोगे और परिणामस्वरूप दुनिया का प्यार तुम्हारे दिलों में बस जाएगा और तुम शांति,शांति की धुन गाते रहोगे, इसलिए तुम्हारी ऐसी स्थिति होगी कि तुम्हारी संख्या तो बहुत अधिक होगी लेकिन तुम समुद्र के झाग की तरह होंगे, जिन्हें चुटकियों में मसल दिया जाएगा।

وما علینا الا البلاغ

1 नोट: यहाँ एक बात याद रखनी है, कि फिक्ह की किताबों में आम तौर पर यह बात मिलती है, कि इन चार स्थितियों में महिलाओं पर भी निकलना फर्जे ऐन है। बल्कि मसअला वैसा नहीं है। बल्कि औरतों का अपवाद है। सामान्य महिलाएं जिहाद में संबोधित नहीं हैं, इसलिए वह जिहाद छोड़ने में पापी नहीं होंगी। यह कहा जा सकता है कि महिलाओं का एक हद तक अपवाद है। सेना के रूप में केवल महिलाएं नहीं निकलेंगी इसलिए कि वह संबोधित नहीं मगर महिलाओं के अंतर्गत निकल सकती हैं। तबुक इसका एक उदाहरण है। जिहाद में भाग न लेने से मुनाफिकों पर तो क्रोध हुआ मगर महिलाओं पर नहीं, न ही रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें फटकार लगाई, जबकि तबुक फर्जे ऐन जिहाद था। इससे पता चलता है औरतें प्रत्यक्ष मुकललफ नहीं हैं।

शेख अब्दुलकादिर इब्नअब्दुलअज़ीज़ फक्कल्लाहु असरह लिखते हैं:

قلت: وما ذكره السادة الفقهاء من وجوب الجهاد العيني على المرأة فيه نظر، وقد يَظُن البعض أن هذه المسألة أجمع عليها العلماء أو هي قول جمهور الفقهاء، وليس الأمر كذلك.

فالذين قالوا بوجوب الجهاد على المرأة في كل مواضع الجهاد العيني، أخذوا هذا من القاعدة الفقهية القاضية بأن فروض العين تجب على كل مسلم مكلف (بالغ عاقل) بلا تفريق بين الذكر والأنثى. كما نقلته عن الكاساني من الأحناف والرملي من الشافعية.

إلا أن النصوص الشرعية الخاصة بجهاد النساء تخالف هذه القاعدة ويجب الأخذ بها. وتفصيلها كالتالي:

روى البخاري في كتاب الجهاد من صحيحه (باب جهاد النساء) عن عائشة «استأذنت النبي صلى الله عليه وسلم في الجهاد، فقال جهادكن الحج». قال ابن حجر: [وقال ابن بطال: دل حديث عائشة على أن الجهاد غير واجب على النساء، ولكن ليس في قوله: «جهادكن الحج» أنه ليس لهن أن يتطوعن بالجهاد] ، وفي رواية أحمد بن حنبل عن عائشة قالت: «قلت: يا رسول الله هل على النساء جهاد؟ قال: جهاد لا قتال فيه: الحج والعمرة» ، فهذا الحديث بَيَّن أن المرأة غير مخاطبة بالجهاد بدون تفريق بين ما هو فرض كفاية وما هو فرض عين. وكذلك لم يفرق الشراح (ابن حجر وابن بطال) بين الفرضين في حق النساء

अल उम्दा फी एदादिल उद्दह पृष्ठ 23 अब्दुलकादिर इब्नअब्दुलअज़ीज़ फक्कल्लाहु असरह

 

2 फिक्ह की किताबों में एक और सूरत है। कि जब किसी मुस्लिम पुरुष या महिला को कोई काफिर कैद कर लेता है, तो उन मुसलमानों को काफिरों की कैद से मुक्त करने के लिए भी जिहाद फ़र्जे ऐन हो जाता है। जैसा कि शहीदुलउम्मत शेख डॉक्टर अब्दुल्ला अज़्जाम रहिमहुल्लाह अपनी प्रसिद्ध और लोकप्रिय पुस्तक दिफा अन अराजिल मुस्लिमीन में कहते हैं।

۴۔۔ إذا أسر الكفار مجموعة من المسلمين

(एवं यह मसअला फिक्हे हनफी की प्रमाणित और लोकप्रिय किताब फतावा काज़ी खान में भी लिखा हुआ है। अनुवादक)

आगे चलकर कहते हैं।

इमाम इब्न अलअरबी रहिमहुल्लाह अहकामउलकुरान में कहते हैं

وقد تكون حالة يجب فيها نفير الكل اذا تعين الجهاد على الأعيان بغلبةالعدو على قطرمن الاقطار او لحلو له بالعقر فيجب علي كآفة الخلق الجهاد و الخروج، فان قصرواعصوا.

فإذا كان النفير عاما لغلبة العدو علي الحوزة أو استيلائه على الأسارى كان النفير عاما ووجب الخروج خفافا وثقالا، ركبانا و رجالا، عبيدا و أحرارا….،

من كان له أب من غير اذنه ومن لا أب له، حتي يظهر دين الله و تحمي البيضة وتحفظ الحوزة ويخزى العدو و يستنفذ الأسرىٰ ولا خلاف فى هذا.

فكيف يصنع الواحد إذا قعد الجميع؟ يعمد إلى أسير واحد فيفديه و يغزو بنفسه إن قدرو إلا جهز غازيا.

अनुवाद: ऐसे हालात भी पैदा हो सकते हैं, जब नफीरे आम(सार्वजनिक रूप से निकलना) फर्ज हो जाए। इसलिए जब दुश्मन मुसलमानों की जमीन पर हमला करे, या उनके कुछ इलाके को घेर ले, तो जिहाद प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से फर्ज हो जाता है। और सभी लोगों के लिए जिहाद करना और इसके लिए अपने घर छोड़ना फर्ज हो जाता है। ऐसी स्थिति में यदि वह फर्ज अदा करने में कोताही करें तो गुनहगार होंगे।

अत: यदि शत्रु द्वारा हमारे किसी क्षेत्र पर कब्जा करने, या मुसलमानों को पकड़कर उन्हें कैदी बनाने के कारण से नफीरे आम का हुक्म हो जाए, तो सभी लोगों पर जिहाद के लिए बाहर निकलना फर्ज हो जाता है, चाहे वह हल्का हो या भारी, पैदल हो या सवार, गुलाम हो या आजाद, जिसका बाप ज़िंदा है, उसकी इजाज़त के बगैर निकले और जिसका बाप मर चुका है वह भी निकले। (और जिहाद करता रहे) यहां तक कि अल्लाह का धर्म हावी हो जाए, मुसलमानों की धरती से दुश्मन की बुराई दूर हो जाए, इस्लामी सीमाओं की रक्षा हो जाए, दुश्मन पूर्णतः पराजय हो जाए, सभी मुस्लिम कैदी आजाद हो जाएं। इस बारे में विद्वानों के बीच कोई मतभेद नहीं है।

लेकिन (सवाल यह है) अगर सभी लोग जिहाद को छोड़ दिए हों तो एक अकेला व्यक्ति क्या करे?

उसे चाहिए वह एक कैदी ढूंढे और पैसे देकर उसे आज़ाद कराए। और अगर उसके पास ताकत है, तो वह अकेले लड़े। और अगर उसके पास ताकत नहीं है, तो उसे कोई और मुजाहिद तैयार करना चाहिए, और उसे सामान प्रदान करना चाहिए।

(अहकामुल कुरआन भाग 2)

 

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